10. भारतीय चाय नियंत्राण (संशोधन) विधेयक - Page 78

भारतीय चाय नियंत्रण (संशोधन) विधेयक 53

करने के संबंध में थी। तीसरी सिफारिश श्रमिकों के कल्याण के लिए सुविधाजनक क्षेत्रों में ऐसा स्वास्थ्य बोर्ड स्थापित करने की थी जिसे पीने का पानी, सफाई, जल निकासी, स्वास्थ्य सुविधाएं और आवास संबंधी नियम बनाने की शक्ति प्राप्त हो। चौथी सिफारिश यह थी कि श्रमिकों को नियमित रूप से शीघ्र पारिश्रमिक भुगतान करने और उन्हें दिए गए अग्रिम भुगतान से कटौती करने संबंधी प्रावधान चाय बागान के श्रमिकों को भी उपलब्ध होने चाहिए। अंतिम सिफारिश थी कि चाय बागानों को जनता तक पहुंचाने के लिए उपयुक्त प्रावधान किए जाएं।

इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि जब ये सिफारिशें की गई थी तब भारत सरकार ने बिना समय बर्बाद किए इन सिफारिशों की समीक्षा यह पता लगाने के लिए की कि इन सिफारिशों से निबटने के लिए कौन सा समुचित प्राधिकरण हो सकता है, और वह इस निष्कर्ष पर पहुंची कि सिवाय पहली सिफारिश के, जिसका संबंध उत्प्रवास अधिनियम को निरसित करने और उसे दूसरे अधिनियम द्वारा प्रतिस्थापित करने से था, अन्य सभी सिफारिशें वैध दृष्टि से मूलतः स्थानीय रूप से निबटाने योग्य थीं। मैं नहीं समझता हूं कि कोई व्यक्ति इस बात को लेकर विरोध प्रकट करेगा कि इन सिफारिशों के मुताल्लिक दायित्वों को बांटने में भारत सरकार द्वारा अपनाया गया रवैया सही नहीं था। मेरा निवेदन यह है कि रॉयल श्रम कमीशन की सिफारिशों के संबंध में जो निर्णय भारत सरकार ने लिया था उसके अनुसरण में उसने असम सरकार को यह सूचना देते हुए तुरंत एक पत्र लिखा कि स्थानीय सरकार को अन्य सिफारिशों के संबंध में कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी जाती है और जैसाकि माननीय सदस्यगण जानते हैं, भारत सरकार ने बिना समय खोए इस विषय में अधिनियम पारित करने की कार्रवाई भी की, जो कानूनी पुस्तक में दर्ज है और इसके अंदर रॉयल श्रम कमीशन की पहली सिफारिश आ गई है। महोदय, दुर्भाग्यवश किन्हीं कारणों के चलते, जिनकी जानकारी मुझे नहीं है, असम की स्थानीय सरकार इस विषय में कोई कार्रवाई नहीं कर सकी। और, यदि मुझे ऐसा कहने की इजाजत हो, तो मेरे माननीय मित्र श्री जोशी ने भी, यद्यपि वे सिफारिश की जाने के समय से बराबर इस सदन में रहे हैं, कभी इस प्रश्न को लेकर कोई कदम न तो उठाया और न ही उठा रहे हैं। परंतु, महोदय, मैं इसका श्रेय भारत सरकार को देना चाहता हूं कि उसने वास्तव में इस ओर भी कदम उठाया। मैं सदन को सूचित करना चाहूंगा कि जब सन् 1938 में चाय नियंत्रण अधिनियम को उसकी अवधि बढ़ाने के लिए विधानमंडल में पेश किया गया तो भारत सरकार ने पहल करके चाय बागान उद्योग के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह बागान श्रमिकों की दशा की जांच-पड़ताल करे। मेरे माननीय मित्र, श्री ग्रिफथ और सर फ्रेड्रिक जेम्स को स्मरण होगा कि श्रम विभाग और बागान मालिकों के प्रतिनिधियों के बीच एक सम्मेलन भी हुआ था।