भारतीय चाय नियंत्रण (संशोधन) विधेयक
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पर एक जगह से दूसरी जगह बदली हुई हैं। कार्य की शर्तों और अवस्थाओं में कोई सामान्य और एकरूप मानक नहीं होता। भारत सरकार नहीं सोचती है कि यह ऐसे हालात हैं जिन्हें वह बर्दाश्त कर सकती है। यह भी स्पष्ट है कि हम तब तक किसी विधि निर्माण की ओर कदम नहीं बढ़ा सकते जब तक कि किसी निष्पक्ष जांच द्व ारा इसके लिए पर्याप्त सामग्री हमारे सामने नहीं आ जाती। यह ऐसी स्थिति नहीं है जिसे यह कहा जाए कि भारत सरकार ने ऐसे कदमों को बाधित करने के उद्देश्य से ढूंढ निकाला है जो बागान के श्रमिकों के हितों की रक्षा करने के लिए उठाए जा सकते हैं। मेरे माननीय मित्र श्री जोशी स्वयं याद करेंगे कि रॉयल श्रम कमीशन द्वारा उठाए गए अनेक प्रश्नों में से यह भी एक था। रॉयल कमीशन ने सिफारिश करते समय यह परंतुक जोड़ा था कि उसकी सिफारिशों को कार्यान्वित करने से पहले बागानों में विद्यमान परिस्थितियों की विशेष जांच कर ली जानी चाहिए। अब, महोदय, भारत सरकार को इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसी जांच अवश्य की जानी चाहिए। सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए मैं यह कहने को तैयार हूं कि सरकार यह सोच रही है कि श्रम कल्याण संबंधी समुचित मानदंड बागानों में अवश्य लागू किए जाएं। इससे बचा नहीं जा सकता_ मेरे माननीय मित्र श्री जोशी ने जो कहा है मैं उसका पूरा समर्थन करता हूं। भारत सरकार यह नहीं कर सकती कि श्रीलंका पर तो मजदूरी की उचित शर्तें एक पूर्वगामी उदाहरण के रूप में लागू करें, पर श्रमिकों के लिए वहीं मानदंड भारत में लागू किए जाएं। विभिन्न अध्यादेशों के द्वारा भारत सरकार ने यह प्रावधान किया है कि जहां कहीं श्रमिकों पर कोई प्रतिबंध लगाया गया है वहां भारत सरकार आश्वस्त करेगी कि श्रमिकों को काम की सुकर दशाएं मुहैया कराई जाएं। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि बहुत पहले बागानों की जो कुछ भी स्थितियां रही हों, अभी वर्तमान में स्थिति ऐसी है कि वे मजदूरी के ऐसे मानकों को भार वहन कर सकते हैं, जो बोर्ड उन पर अधिरोपित करें। अतः अब मात्र यह प्रश्न उठता है कि क्या हम इस समय में कोई जांच बिठा सकते हैं। मेरे माननीय मित्र श्री जोशी और भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए मेरे विचारों में इन दोनों प्रश्नों को लेकर कोई मतभेद नहीं है। उदाहरण के लिए, समुचित मानदंड अवश्य निर्धारित किए जाएं। जैसा कि मेरे माननीय मित्र श्री जोशी और सदन के अन्य माननीय सदस्य अच्छी तरह जानते हैं, चाय बागानों का बहुत बड़ा भाग भारत के पूर्वी, कोने, असम और बंगाल में स्थित है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि यह क्षेत्र दुश्मनों की कार्रवाई के लिए एकदम खुला हुआ है। इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि इस भू-भाग में आरंभ की जाने वाली किसी भी जांच का प्रभाव विक्षोम पैदा करने वाला होगा। अतः जो एकमात्र प्रश्न रह जाता है वह यह है कि क्या हम ऐसे चाय बागानों में जो दक्षिण भारत में स्थित हैं यह जांच शुरू कर सकते हैं। मैं सदन को बताना चाहूंगा कि किस तरह उत्तरी और दक्षिणी भारत में चाय बागान विभाजित हैं। आंकड़े जो मेरे पास हैं और जिनका संबंध सन् 1941 से है, दिखलाते हैं कि, जहां तक चाय बागानों