11. युद्ध आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक - Page 83

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अब मुआवजे के प्रश्न को लेते हुए मैं जिस मुद्दे की ओर सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं वह यह है कि यह विधेयक एक संबद्ध उपाय है। यह कामगार मुआवजा अधिनियम से जुड़ा हुआ है। इस विधेयक का युद्ध आघात अध्यादेश से, जिसकी ओर मैंने पहले ही इशारा किया है, संबंध बिल्कुल स्पष्ट है। माननीय सदस्यों को स्मरण होगा कि युद्ध आहत अध्यादेश, 1941 परिभाषित करता है कि मुआवजे के लिए पात्र आघात क्या हैं। इस अध्यादेश में ऐसे आघातों को वर्गीकृत किया गया है। प्रस्तुत विधेयक में युद्ध आघात अध्यादेश में यथापरिभाषित पात्र आघातों की परिधि और सीमाओं को समाविष्ट करने का प्रयास किया गया है। जहां तक प्रस्तुत विधेयक का कामगार मुआवजा अधिनियम से संबंध का प्रश्न है, माननीय सदस्यों को यह संबंध इस तथ्य से स्पष्ट होगा कि इस विधेयक में युद्ध से क्षतिग्रस्त लोगों के लिए जो मुआवजा राशियां नियत की गई हैं वे कमाबेश उसी मापमान पर आधारित हैं जो कामगार मुआवजा अधिनियम में निर्धारित किए गए हैं।

महोदय, इस विधेयक को प्रस्तुत करने का कारण यह है कि युद्ध आहत अध्यादेश, 1941 के पारित होने के पश्चात एक प्रश्न उठाया गया - ऐसा प्रश्न जिसमें कुछ दम है और अगर मैं कहूं तो महत्वपूर्ण भी है। यह प्रश्न है कि क्या किसी कामगार को जो दुर्भाग्यवश ऐसा आघात उठा चुका है जिसे पात्र आघात कहते हैं, किया जाने वाला भुगतान राहत के रूप में होगा या मुआवजे के रूप में होगा। मुआवजा और राहत के बीच क्या अंतर है, स्पष्ट है। राहत किसी व्यक्ति को ऐसी दिक्कतों, जिसमें वह फंस चुका है, से उबरने के लिए मात्र मदद के रूप में दी जाती है क्योंकि युद्ध की क्षति से आक्रांत होने के कारण वह सामान्य मजदूरी अर्जित कर पाने से अक्षम होता है। दूसरी ओर कामगार मुआवजा अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किया गया भुगतान ऐसा संदाय है जो आहत व्यक्ति को क्षति की पूर्णतः प्रतिपूर्ति करता है। जब यह प्रश्न उठाया गया तब इंग्लैंड में प्रचलित किन्हीं शर्तों का उल्लेख किया गया था और यह पाया गया कि ब्रिटिश संसद ने एक अधिनियम पारित किया था जो युद्ध आहत प्रकीण अधिनियम, 1936 के नाम से जाना जाता है। इस अंग्रेजी विधान के उपबंधों की जांच से पाया गया कि उस अधिनियम के अधीन जो भुगतान किया जाता है वह मुआवजे के बराबर है और मात्र राहत नहीं है। स्पष्टतः यह प्रश्न उठा कि क्या भारत सरकार के लिए उन सिद्धांतों का, जो ब्रिटिश कानूनों में अधिकथित किए गए हैं, अनुकरण करना वांछनीय है या नहीं है। दूसरे, कुछ नियोजकों ने युद्ध आघात अध्यादेश, 1941 के पारित किए जाने के पश्चात अपने आप भारत सरकार को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने अपना दृष्टिकोण जाहिर किया था कि युद्ध आघात अध्यादेश में किए गए उपबंध श्रमिकों के नैतिक बल को बनाए रखने के