युद्ध आहत (मुआवजा बीमा) विधेयक
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लिए अपर्याप्त हैं और भुगतान ऐसा किया जाना चाहिए कि उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक अपने कार्य से विचलित न हों। इन दोनों दृष्टिकोणों को ध्यान में रखकर, भारत सरकार ने कामगारों को उस राशि के बदले जिसे आरंभ में राहत के रूप में दिया जाना था मुआवजा देने के सिद्धांत को मान लिया।
युद्ध आहत अध्यादेश के उपबंधों की जांच करने पर यह पता चला कि इस अध्यादेश के अधीन भुगतान की जाने वाली 24 रुपए के स्तर की रकम न केवल राहत था बल्कि मुआवजा भी थी। अतः यह आवश्यक है कि जो कामगार 24 रुपए की रकम से अधिक वेतन पा रहे हैं उन्हें अतिरिक्त रिबेट दी जाए, जो उन्हें दी राशि को मुआवजे के बराबर कर दे। अर्थात्, जो राशि वह अध्यादेश के अधीन पाता है, उसकी अनुपूरक वह रकम होगी। यह ऐसा उपाय है जिसे अनुपूरक उपाय कहा जा सकता है जो युद्ध आघात अध्यादेश, 1941 का अनुपूरक है।
सदन को मुख्य उपबंध अर्थात मुआवजे की बात स्पष्ट करने के बाद और यह बतलाने के बाद कि किस तरह यह विधेयक आहत अध्यादेश और कामगार मुआवजा अधिनियम से संबंधित है, और सदन को वह कारण जिसके चलते भारत सरकार यह अनुपूरक विधेयक लाने को बाघ्य हुई है, स्पष्ट करने के बाद, मैं अब विधेयक का दूसरा मुख्य उपबंध स्पष्ट करने की ओर बढूंगा। यह दूसरा उपबंध नियोजक को ऐसे मुआवजे के लिए उत्तरदायी बनाने के संबंध में है। यह कहा जा सकता है कि युद्ध आहत अध्यादेश के उपबंधों के अधीन चूंकि सरकार राहत देने का दायित्व अपने ऊपर लेती थी, अतः सरकार को उसी तरह मुआवजा उन लोगों को देने का दायित्व भी लेना चाहिए जिन पर कि प्रस्तुत विधेयक लागू होता है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सरकार के लिए ऐसा दायित्व लेना संभव नहीं है जो मामले की परिस्थिति के अनुसार कुछ भी हो सकता है क्योंकि भारत में इस समय जो स्थिति है वही रही आई तो कोई दायित्व ही नहीं होगा। या, यदि परिस्थति बिगड़ती है, तो दायित्व बिल्कुल अनिश्चित होगा, और भारत सरकार की क्षमता को ध्यान में रखते हुए यह बिल्कुल स्पष्ट है कि इस तरह का अनिश्चित दायित्व लेने को सरकार से नहीं कहा जा सकता है कि सरकार इस मामले में दायित्व नहीं ग्रहण कर रही है क्योंकि यह स्पष्ट है कि इस दायित्व के द्वारा नियोजक जो कुछ मुआवजा देने को बाघ्य होगा वह निस्संदेह ई.पी.टी. के अधीन अनुज्ञेय राजस्व व्यय माना जाएगा और परिणामतः इसका मुख्य भार अंततोगत्वा सरकारी खजाने पर पड़ेगा।
मैं यहां यह भी उल्लेख कर दूं कि जब भारत सरकार का प्रयास नियोजकों पर यह दायित्व थोपने का है, तो वह अपने ही कर्मचारियों के प्रति अपने दायित्व को