सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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आवश्यक हो गया था कि इस मांग को किसी न किसी प्रकार पूरा किया जाए। इस विषय पर उन्होंने अपनी पुस्तक [‡] में वह प्रस्ताव किया था कि दुविधा का निबटारा ऐसा समाधान को स्वीकार करके किया जाए जैसा कि 1920 में श्री एसक्विथ ने आयरिश समस्या के समाधान सुझाव दिया था कि अलसर को छः वर्ष के लिए शेष आयरलैंड से अलग कर दिया जाए, परंतु देश के दोनों भागों के प्रतिनिधियों की एक परिषद् स्थापित की जाए जो इस अवधि में दोनों भागों के मामलों को निपटाए। छः वर्ष की अवधि के अंत में अलसर को यह चुनना होगा कि दक्षिणी आयरलैंड से अलग रहे अथवा उसके साथ मिल जाए। इसी प्रकार डॉ. अम्बेडकर ने प्रस्ताव किया कि पाकिस्तान को 10 वर्ष के लिए स्वतंत्रता दी जानी चाहिए और इस अवधि के अंत में यह विदित होगा कि क्या वह आर्थिक रूप से क्षम है। उन्होंने स्वीकार किया कि यदि पाकिस्तान के लोग उस समय इस बात को इच्छा प्रकट करें कि वे हिन्दुस्तान में शामिल हो जाएंगे, तब उनकी कमजोर स्थिति होगी और मोल-तोल करने वाले सभी मंच दूसरी ओर के होंगे। दस वर्ष की अवधि में एक संयुक्त परिषद् हो सकती है, परंतु यह विशुद्ध रूप से सलाहकार होगी और इसमें कार्यकारी अधिकार नहीं होंगे। मुसलमान इस समय ऐसी मनःस्थिति में हैं कि यदि उन्हें किसी भी अखिल भारतीय केन्द्रीय सरकार में शामिल होने के लिए तैयार कर भी लिया जाए तो ऐसी स्थिति में वे दुर्बल और व्यर्थ सिद्ध होंगे। मुसलमानों की पाकिस्तान की मांग के अतिरिक्त और भी अलगाववादी प्रवृत्तियां मौजूद हैं और केन्द्रीय सरकार केवल ऐसी होनी चाहिए जो सशक्त सरकार हो और देश की अखंडता को बनाए रख सके।
संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व के तरीके पर प्रश्न के उत्तर में डाक्टर अम्बेडकर ने कहा कि वह संविधान सभा को बिल्कुल ही नहीं चाहते। इसमें सवर्ण हिन्दुओं का आधिपत्य होगा और अनुसूचित जातियों के लोग कुछ भी न होकर केवल एक छोटा सा अल्पसंख्यक वर्ग होंगे जिन्हें मत द्वारा कभी भी हराया जा सकता है, चाहे विधान सभा के चुनावों में तीन-चौथाई या दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता हो। सुरक्षा के सभी आश्वासन जो महामहिम की सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए दिए थे समाप्त हो जायेंगे। इसके अलावा, विधान सभा में भ्रष्टाचार फैलेगा- सदस्यों को अपने समुदायों के हितों के लिए मत देने के लिए खरीदा जाएगा।
उनका अपना प्रस्ताव यह था कि संविधान सभा के लिए जो कार्य सोचे गए थे, उन्हें दो वर्गो में बांटा जा सकता है, अर्थात्-
(क) संवैधानिक प्रश्न, उद्धारणार्थ-विधान सभा और कार्यपालिका के बीच संबंध तथा क्रमशः उनका गठन और कार्य। इन मामलों के बारे में कोई ऐसा विवाद नहीं था जिसने आवेगों को उत्तेजित न किया हो। इनसे जूझना इस प्रकार के व्यक्ति की