16. डॉ. अम्बेडकर का भारत के गर्वनर जनरल लार्ड वेवल को पत्र - Page 105

90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अनुसूचित जातियों की मांगों के लिए अन्य पार्टियों से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है जैसा कि मैंने अपने 5 अप्रैल, 1946 के साक्षात्कार के दौरान जोरदार शब्दों में कहा था।

बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अलग निर्वाचित क्षेत्र की मांग पंजाब, उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रदेश, सिंध और बंगाल के मुसलमानों के बारे में की गई थी जो अनुसूचित जातियों जैसे अल्पसंख्यक समुदाय के अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग के आधार से नितांत भिन्न है। बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग के लिए अल्पसंख्यक समुदाय की अनुमति लेना भी आवश्यक है। परंतु अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग बहुसंख्यक समुदाय की इच्छा पर कभी भी निर्भर नहीं करती। बहुसंख्यक की तुलना में अल्पसंख्यक को बचाने के लिए ही मुख्यतः चुनाव के तंत्र को जन्म दिया गया है। ऐसी स्थिति में, निर्वाचन संयुक्त रूप से किया जाए अथवा अलग रूप से, यह प्रश्न पूर्णतया अल्पसंख्यक वर्ग पर छोड़ देना चाहिए वह यह जानता है कि उसके हित में सर्वोत्तम क्या है। बहुसंख्यक वर्ग को इस मामले में कुछ भी नहीं कहना चाहिए तथा अल्पसंख्यक वर्ग के निर्णय को स्वीकार कर लेना चाहिए। यदि इसका अनुसरण किया जाए तो हिन्दुओं के पास यह कहने को बहुत कम होगा कि अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाएं अथवा न बनाए जाएं।

अनुसूचित जातियों की अलग निर्वाचन-क्षेत्र की मांग का किसी अन्य समुदाय और हिन्दुओं पर भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। यही कारण है कि इस मांग को अन्य सभी समुदाय स्वीकार करते हैं। हिन्दुओं का यह तर्क है कि अनुसूचित जातियां हिन्दू हैं अतः उनके अलग निर्वाचन-क्षेत्र नहीं होने चाहिए। उनकी यह बात अलग निर्वाचन-क्षेत्र की असलियत दूर है, क्योंकि वास्तव में यह अल्पसंख्यकों के संरक्षण की एक व्यवस्था है जिसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यदि इसके बारे में किसी साक्ष्य की आवश्यकता है तो यूरोपीय लोगों, एंग्लो-इंडियनों और भारतीय ईसाईयों का साक्ष्य दिया जा सकता है जो धर्म की दृष्टि से एक हैं फिर भी प्रत्येक के लिए अलग-अलग निर्वाचन-क्षेत्र हैं।

यदि केबिनेट मिशन इन तथ्यों और तर्को पर विचार करता तो यह अस्वाभाविक नहीं होता कि उसने अनुसूचित जातियों के इस तर्क को स्वीकार कर लिया होता कि इसमें हिन्दुओं की अनुमति की आवश्यकता नहीं है, और यह सारा मामला केबिनेट मिशन के लिए निर्णय करने का है-विशेषकर उस समय जब यह सिद्ध हो गया है कि संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र ने अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व को एक मजाक बना दिया गया है।

अनुसूचित जातियों की दूसरी मांग यह है कि अंतरिम सरकार में उनका प्रतिनिधित्व मुसलमानों को दिए गए प्रतिनिधित्व का 50» होना चाहिए। यह ऐसा मौका है जिसके