सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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स्वीकार किए जाने के लिए हिंदुओं के मत की आम सहमति की आवश्यकता नहीं है। यह बात मिशन के निर्णय करने की है कि अनुसूचित जातियों का केन्द्रीय कार्यपालिका में कितना प्रतिनिधित्व होना चाहिए और इस हेतु मिशन को उनकी संख्या पर विचार करना चाहिए तथा उन अयोग्यताओं को देखना चाहिए जिनसे वे पीडि़त हैं क्योंकि उन्हें वह मार्ग बनाना है जिससे वे अन्य उन्नत समुदायों की पंक्ति में आ सकें। आपको यह याद होगा कि मैंने यह प्रश्न गत शिमला सम्मेलन के अवसर पर उठाया था और आप अनुसूचित जातियों को दो सीटें देने के लिए तैयार थे और यह कोटा मुसलमानों को दी जाने वाली सीटों का 50» से कुछ ही कम था।
तीसरी मांग में कुछ भी नया नहीं है। यह केवल आपके उस विचार को दोहराता है जिसे आपने श्री गांधी को अपने 15 अगस्त, 1944 के पत्र में व्यक्त किया है। इस पत्र के पैरा 5 में आपने कहा है-
‘‘इन परिस्थितियों में यह स्पष्ट है कि आपने जो सुझाव दिया है, उसके
आधार पर विचार-विमर्श करने से कुछ लाभ नहीं होगा। फिर भी, यदि
हिन्दुओं, मुसलमानों और महत्वपूर्ण अल्पसंख्यकों के नेताओं ने वर्तमान
संविधान द्वारा स्थापित तथा कार्यशील अस्थायी सरकार को सहायता देने के
लिए इच्छा प्रकट की, तो मेरा विश्वास है कि अच्छी प्रगति हो सकती है।
ऐसी अस्थई सरकार के बनाए जाने से पूर्व, उसकी सफलता आश्वस्त करने
के लिए यह आवश्यक है कि सैद्धांतिक रूप से हिन्दुओं, मुसलमानों और
अन्य महत्वपूर्ण तत्वों में ऐसे तरीके के लिए सहमति होनी चाहिए जिसके
द्वारा नए संविधान की रचना की जाए।’’
आपने जिस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, उसके बारे में यह मान कर चलना होगा कि यह सिद्धांत महामहिम सरकार की ओर से बना है और इस प्रकार यह केबिनेट मिशन पर भी लागू होगा। इस सिद्धांत के प्रभावी बनने के लिए मिशन के लिए पार्टियों की सहमति लेना बिल्कुल अनावश्यक है और वही मांग अनुसूचित जातियों ने की है।
मेरा निवेदन है कि इन तर्कों में यह निष्कर्ष निकालने की काफी शक्ति है कि मिशन यह नहीं समझता कि अनुसूचित जातियों की मांगों के बारे में मिशन की घोषणा से पूर्व हिन्दुओं की अनुमति लेना आवश्यक है और यही कारण है कि अनुसूचित जातियों को अपने प्रतिनिधि शिमला सम्मेलन में भिजवाने के लिए कहा गया है।
परंतु दुर्भाग्यवश मात्र यही व्याख्या किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में नहीं आती। एक