18. डॉ. अम्बेडकर का श्री ए.बी.एलेक्जेंडर, सदस्य, केबिनेट मिशन, को पत्र - Page 110

सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार

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  1. मेरी समझ से केवल यह कहना ठीक है कि आज हिन्दू और मुसलमान दोनों ही मानसिक रूप से अक्षम हैं कि इस देश के भाग्य का निर्णय क्या किया जाए। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही भीड़ की तरह हैं। यह बात आपके अनुभव की होगी कि भीड़ सामूहिक सहभागिता के आवेग से अधिक और पदार्थगत लाभ से कम प्रभावित होती है। यह अधिक सरल है कि लोगों के बड़े समूह को बलिदान के लिए फुसला लिया जाए अपेक्षा इसके कि हितों का शांतिपूर्ण आकलन करके उस पर कार्यवाई की जाए। भीड़ सरलता से हित और अहित की समझ खो बैठती है। वह संवेगों से आंदोलित होती है जो ऊंचे अथवा नीचे हो सकते हैं, जो दयालु अथवा निर्दयी हो सकते हैं_ परंतु वह सदा तर्क से परे या नीचे होती है। प्रत्येक की सामान्य समझ सभी के संवेग में खो जाती है। भीड़ को पैतृक संपत्ति स्वीकार करने की अपेक्षा आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकना सरल है। यह मेरे लिए ठीक नहीं है कि मैं आपको परामर्श दूं। मिशन ने भंगी बस्ती और 19 औरंगजेब रोड से अधिक बुद्धि और उच्च प्रेरणा प्राप्त की है। मैं इस बुद्धिमत्ता तथा प्रेरणा के मूल्य के संबंध में एक शब्द भी नहीं कहूंगा। परंतु मैं यह अवश्य सोचता हूं कि मिशन को शीघ्रता में वृद्ध व्यक्ति के दुःखद दृश्य जैसा प्रदर्शन नहीं करना था, जैसा कि चैम्बरलेन ने एक बार आयरिश होम रूल के आंदोलक ग्लेडस्टोन के बारे में कहा था। राजनीति में जिसे ‘प्रशीतन अवधि’ कहते हैं उससे समस्याओं से निपटाना आसान हो जाता है।

  2. पर यह बात तो मिशन, बड़ी पार्टियों और उन लोगों के लिए है जिन्होंने बड़ी पार्टियों में अपना विश्वास रखा है। मैं केवल यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि आप अछूतों की समस्या का किस प्रकार समाधान करना चाहते हैं तथा उनकी संवैधानिक सुरक्षा की मांग को किस प्रकार पूरा करना चाहते हैं। मिशन ने शिमला विचार-विमर्श के अंतिम दिन अधिकारिक वक्तव्य जारी किया और इस वक्तव्य में बताया गया कि मिशन दिल्ली लौट आने के बाद थोड़े ही दिनों में अगले कदम की घोषणा करेगा कि उसके क्या प्रस्ताव हैं। यह स्पष्ट है कि सभी अनुसूचित जातियों के लोगों की आंखें इस घोषणा की ओर लगी हुई है। मिशन क्या करेगा, इससे अंततोगत्वा उनमें भाग्य का निर्णय हो जाएगा। मिशन का निर्णय या तो अछूतों के जीवन, स्वतंत्रता और प्रसन्नता का मार्ग प्रशस्त करेगा अथवा वह उनकी मौत का कारण बन जाएगा। यह प्रश्न जीवन और मृत्यु का है। यह गलत नहीं होगा यदि मैं अछूतों की समस्या की ओर आपका ध्यान आकर्षित करूं।

  3. अछूतों की समस्या का सामना करना अछूतों के लिए बड़ा विकट काम है। परंतु सौभाग्यवश इसे समझना सरल होगा यदि केवल आगे दिए गए तथ्यों पर ध्यान दिया जाए। अछूत विशाल हिन्दू जन-समूह से घिरे हैं जो उनका विरोधी है और जिसे उनके साथ असमानता अथवा अत्याचार करने में लज्जा नहीं आती। ऐसे अन्यायों