96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
को दूर करने के लिए जो उनके विरूद्ध प्रतिदिन होते हैं अछूतों को प्रशासन की सहायता चाहिए। इस प्रशासन की प्रकृति और गठन क्या होगा? सारांश में यह कहा जा सकता है कि भारत में प्रशासन पूर्णतया हिन्दुओं के हाथ में है। इस पर उनका एकाधिकार है। ऊपर से लेकर नीचे तक शासन नियंत्रण हिन्दुओं के हाथ में है। कोई भी ऐसा विभाग नहीं है जहां हिन्दुओं का आधिपत्य न हो। उनका आधिपत्य पुलिस, न्यायपालिका और राजस्व सेवाओं पर है और वास्तव में प्रशासन की प्रत्येक शाखा पर हिन्दुओं का आधिपत्य है। दूसरी बात याद रखने की यह है कि प्रशासन क्षेत्र में हिन्दू न केवल समाज-विरोधी है, अपितु निश्चित रूप से अछूतों के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। उनका उद्देश्य है कि अछूतों से भेदभाव रखा जाए तथा उन्हें कानून के लाभ से वंचित किया जाए और दमन व अत्याचार के विरूद्ध उन्हें कानून का सहारा भी न प्राप्त हो। इसका परिणाम यह है कि अछूत हिन्दू जनसंख्या तथा हिन्दू बाहुल्य प्रशासन के बीच फंसे हैं। एक यदि दूसरे के विरूद्ध गलत काम करता है तो दूसरा उसे अभियोगी बनाने की अपेक्षा गलती करने वाले की रक्षा करता है।
इस पृष्ठभूमि को देखते हुए, कांग्रेस के स्वराज का अछूतों के लिए क्या अर्थ है? इसका एक ही अर्थ है, अर्थात् आज तो केवल प्रशासन हिन्दुओं के हाथ में है पर स्वराज के बाद विधान सभा और कार्यपालिका में भी हिन्दुओं का ही प्रभुत्व हो जाएगा। यह निर्विवाद सत्य है कि स्वराज से अछूतों के दुःख बढ़ेंगे। अछूतों को विरोधी प्रशासन का ही सामना नहीं करना पड़ेगा अपितु उन्हें विरोधी अथवा उदासीन विधान-मंडल, निष्ठुर कार्यपालिका और एक ऐसे अनियंत्रित तथा बेलगाम प्रशासन का सामना करना पड़ेगा जो अछूतों की ओर कठोर, विषावत्त और अन्यायपूर्ण भावना रखेगा। यदि इस बात को अन्य शब्दों में अभिव्यक्त किया जाए तो कांग्रेस के स्वराज में अछूतों को उस पतन की नियति से बचाने का कोई उपाय नहीं है जो हिन्दुओं और हिन्दूवाद ने उनके लिए निर्धारित की है।
मेरा विश्वास है कि इससे आपको कुछ अनुमान हो जाएगा कि अछूत क्यों केवल ऐसे मार्ग पर जोर दे रहे हैं जिसके द्वारा वे स्वराज से आने वाले अत्याचार का शिकार न बनें और इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें विधानमंडल में अपना प्रतिनिधित्व मिले ताकि वे हिन्दुओं द्वारा की गई गलतियों और अन्याय का सामना कर सकें। वे कार्यपालिका में अपना प्रतिनिधित्व चाहते हैं ताकि वे अपनी भलाई के लिए योजनाएं बना सकें और वे सेवाओं में भी अपने प्रतिनिधि चाहते हैं ताकि प्रशासन पूर्ण रूप से उनका विरोध न कर सके। यदि आप संवैधानिक सुरक्षाओं के लिए अछूतों की मांग का न्याय स्वीकार करते हैं तो आपको यह समझने में कठिनाई नहीं होगी कि अछूत अपने लिए अलग प्रतिनिधित्व क्यों चाहते हैं। अछूत विधानमंडल में अल्पसंख्यक होंगे। उनकी नियति में अल्पसंख्यक ही रहना है।