सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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ही उनके शासन को स्थापित कराने में सहायता की थी तथा उनकी उस समय रक्षा की थी जब 1857 में सैनिक बगावत के समय देशी बलों के सशक्त गठबंधन ब्रिटिश राज को हिला उठे थे। अछूतों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विचार किए बिना ब्रिटिश ने एक बार में ही उनके जीवन-यापन के स्रोत से उन्हें वंचित कर दिया और उन्हें अपने मूल पत्तन गर्त में झोंक दिया। क्या ब्रिटिश ने उनकी सहायता की कि वे किसी प्रकार अपनी स्वाभाविक असमानताओं को दूर कर सकें? इसका उत्तर भी नकारात्मक है। स्कूल, कुएं और सार्वजनिक स्थान अछूतों के लिए बंद कर दिए गए। यह ब्रिटिश का कर्त्तव्य था कि वे अछूतों को नागरिक के रूप में देखें और उन्हें सरकारी खर्च द्वारा चलाई जाने वाली संस्थाओं में प्रवेश पाने के लिए अधिकारी बनाएं। परंतु ब्रिटिश ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, और सबसे खराब बात यह है कि उन्होंने अपनी अकर्मण्यता को यह कहकर संगत ठहराया कि अस्पृश्यता उनकी देन नहीं है। यह हो सकता है कि अस्पृश्यता उनकी देन न हो, किन्तु सरकार होने के नाते निश्चिय ही अस्पृश्यता मिटा देने का उनका उत्तरदायित्व तो था। कोई भी सरकार जो अपने कृत्यों और कर्त्तव्यों के प्रति सजग है, इस असमानता को दूर करने के लिए बाध्य है। ब्रिटिश सरकार ने क्या किया? उसने ऐसे किसी प्रश्न को नहीं सुलझाया जिसका संबंध हिन्दू समाज के सुधार से था। जहां तक सामाजिक सुधार का सम्बंध है, अछूतों ने ऐसी सरकार के अधीन स्वयं को पाया जिसके लिए उन्होंने कठोर परिश्रम किया और कष्ट सहे, जिए अैर मरे, परंतु यह सब इतिहास में विलीन हो गया। राजनैतिक दृष्टि से, परिवर्तन साधारण था। हिन्दुओं की निरंकुशता पूर्ववत् बनी रही। ब्रिटिश हाई कमान द्वारा इसे कम किए जाने के बजाय, बढ़ावा दिया गया। सामाजिक दृष्टिकोण से ब्रिटिश ने उसी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया जो उन्हें मिली थी और चीन के उस दर्जी के तरीके के अनुसार उसे निष्ठापूर्वक सुरक्षित रखा जिसे जब एक पुराना कोट नमूने के तौर पर दिया गया तो उसने बड़े गर्व के साथ उस कोट जैसा हुबहू कोट बना दिया जिसमें पेंबंद और सभी कुछ ज्यों के त्यों लगे हुए थे। इसका परिणाम क्या हुआ? इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना हुए 200 वर्ष बीत गए हैं किन्तु अछूत, अछूत ही हैं। उनकी दुर्दशा को ठीक नहीं किया गया हैं और उनकी प्रगति के प्रत्येक चरण में रूकावट आई है। वास्तव में यदि ब्रिटिश शासन ने भारत में कुछ भी प््राप्त किया है तो उसने ब्राह्मणवाद को सशक्त किया है और पुनः अनुप्राणित किया है। ब्राह्मण अछूतों के घोर शत्रु हैं और वे ही सभी बुराईयों के जन्मदाता हैं। उन्हीं के कारण अछूतों को वर्षों से यातना भुगतनी पड़ी है।
- आप यहां यह घोषणा करने आए हैं कि ब्रिटिश लोग भारत पर सत्ता छोड़ रहे हैं। इसमें कोई भूल नहीं होगी यदि अछूत यह पूछें कि ‘‘आप किसे यह प्राधिकार