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ऽश्री एटली का डॉक्टर अम्बेडकर को पत्र
पेरिस, एक अगस्त, 1946
(एल/पी एंड जे/10/50ः एफ.एफ. 81-3 और एटली पेपर्स, यूनिवर्सिटी
कॅालेज, ऑक्सफोर्ड
प्रिय अम्बेडकर,
मैंने आपके एक जुलाई के पत्र तथा उसके साथ संलग्न कागजात पर ध्यानपूर्वक विचार किया है। [@]
ऽ ट्रांसफर ऑफ पॉवर, खंड 7, संख्या 105, पृष्ठ 170-72
@ पहली जुलाई को डॉक्टर अम्बेडकर ने श्री एटली को एक लम्बा पत्र भेजा जिसके साथ उन्होंने हाल
ही में किए गए पत्रव्यवहार, ज्ञापन, भाषण और अन्य कागजात संलग्न किए। डॉक्टर अम्बेडकर का पत्र
उस तार के अनुक्रम में था जो उन्होंने 17 जून को श्री एटली को भेजा था और इस तार में भी इन
मुद्दों को उठाया गया था। तार में यह लिखा गया था-
‘‘गत वर्ष आयोजित शिमला सम्मेलन में वायसराय ने मेरे विरोध पर तथा होम गवर्नमेंट की सहमति
से यह आश्वासन दिया था कि 14 सदस्यों की परिषद में दो स्थान अंतरिम सरकार में अनुसूचित
जातियों के प्रतिनिधियों के लिए रखे जाएंगे। मैंने तीन सदस्यों की मांग की थी, पर समझौते में मैंने
दो सदस्यों को स्वीकार कर लिया। अंतरिम सरकार ने कल नए प्रस्ताव घोषित किए हैं और अब
अनुसूचित जातियों को एक स्थान दिया गया है। काफी विचार-विमर्श के बाद वचन भंग किया जाना
एक गंभीर विश्वासघात है। एक सीट देना नितांत अनुचित है। मिशन छः करोड़ अनुसूचित जातियों
के लोगों को प्रतिनिधित्व की दृष्टि से चालीस लाख सिखों और तीस लाख ईसाइयों के बराबर समझ
रहा है। अनुसूचित जाति के नामांकित व्यक्ति अनुसूचित जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करते और उन्हें
समस्त हिन्दू मतों द्वारा चयन किया जाता है तथा ये सदस्य कांग्रेस की देन हैं। अनुसूचित जातियों
के कांग्रेसियों को अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। वे कांग्रेस के प्रतिनिधि है।
केबिनेट मिशन अनुसूचित जातियों पर एक के बाद दूसरी गलती आरोपित किए जा रहा है तथा कांग्रेस
को तुष्ट करने के लिए उनका बलिदान कर रहा है और देश के सार्वजनिक जीवन में उनकी स्वतंत्र
स्थिति को नष्ट किए जा रहा है। कृपया इस मामले में हस्तक्षेप करें तथा फेडरेशन के नामांकित
व्यक्तियों द्वारा भरी जाने वाली दो सीटों को अनुसूचित जातियों को देकर इस गलती के सुधार के
लिए निर्देश दें जिसके बारे में मिशन को ज्ञात है कि यह फैडरेशन अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व
करता है। अनुसूचित जातियां दो सीटों के लिए जोर देती है अथवा एक भी सीट नहीं चाहती। मेरे
इरादे को गलत न समझा जाए इसलिए मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरी कोई इच्छा नहीं है कि मैं
आंतरिम सरकार में सम्मिलित हो जाऊं और मैं बाहर रहूंगा। मैं अनुसूचित जातियों के अधिकारों के
लिए लड़ रहा हूं। आशा है कि ब्रिटिश सरकार में कुछ न्याय शेष बचा है- अम्बेडकर’