सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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ही सीमित नहीं की जा सकती तथा उन सभी तत्वों का वक्तव्य होगी जिनके बारे में हमारा विचार है कि उन्हें सलाहकार समिति में अल्पसंख्यक वर्गों के रूप में शामिल किया जाए। यद्यपि महामहिम की सरकार की ओर से यह केवल मत की अभिव्यक्ति होगी, तो भी निश्चित रूप से इसे सभा की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रयत्न समझा जाएगा और इस प्रकार इससे गंभीर रोष उत्पन्न होगा। इन परिस्थितियों में, मैं यह विश्वास नहीं कर सकता कि इस प्रकार की घोषणा अनुसूचित जातियों के उद्देश्य के लिए लाभदायक होगी।
आपके दूसरे निवेदन के बारे में मुझे कहना है कि मैं नहीं समझता कि 15 मार्च को हाउस ऑफ कामन्स में मेरे भाषण में वे शब्द निहित हैं जिन्हें आप मेरे शब्दऽ बताते हैं। मैंने कहा था- ‘‘हमें अल्पसंख्यकों के अधिकारों का पूरा ध्यान है और अल्पसंख्यकों को भय-रहित जीवनयापन करने का अधिकार होना चाहिए।’’ यह विचार महामहिम सरकार का है और इसकी अभिव्यक्ति 25 मई के मंत्रिमंडल मिशन के वक्तव्य के पैरा 4 में की गई है। मैं नहीं समझता कि महामहिम की सरकार इस अवस्था में कोई अन्य घोषणा करेगी जो उस पैरा में अभिव्यक्त बात की व्याख्या से होती है।
आपका अंतिम निवेदन यह है कि अनुसूचित जातियों के कम से कम दो प्रतिनिधि होने चाहिए जो अनुसूचित जातियों के फेडरेशन द्वारा नामांकित व्यक्ति हों। मुझे खेद है कि मैं इसे संभव बनाने के लिए कोई आशा नहीं दे सकता।
मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि आपको संविधान सभा के लिए चुन लिया गया है।
सी.आर.ए.
ऽ डॉक्टर अम्बेडकर ने इस बात पर बल दिया था कि केबिनेट मिशन पहले ही यह विचार व्यक्त कर
चुका है कि अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिए। उनकी दूसरी मांग
की पूर्ति तभी हो सकेगी जब इस वक्तव्य के साथ इन शब्दों को जोड़ा जाए- ‘‘ऐसे संरक्षण जिनके
फलस्वरूप अनुसूचित जातियां बहुसंख्यकों के भय से मुक्त रहेंगी।’’ ये वही शब्द हैं जिनके बारे में
डॉक्टर अम्बेडकर ने दावा किया था और इन शब्दों का प्रयोग श्री एटली ने 15 मार्च के अपने भाषण
में किया था। वही।