122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मंत्रीमंडलीय शिष्टमंडल (केबिनेट मिशन) के प्रस्तावों पर संसद में 18 जुलाई को जो वाद-विवाद हुआ, उसमें सर स्टेफोर्ड क्रिप्स, श्री अलेग्जेंडर तथा लार्ड पैथिक लारेंस ने इस आलोचना से स्वयं को बचाने का प्रयास किया। उन्होंने दो तर्क दिए-
(1) कि प्रांतीय विधायिका के चुनावों में जो पिछली फरवरी में हुए
थे, अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों को कांग्रेस ने जीत लिया
था, जिससे यह पता चलता है कि अनुसूचित जातियां कांग्रेस के साथ
हैं और वे अपने भाग्य को कांग्रेस के अर्थात् हिन्दुओं के साथ जुड़ा
मानती हैं और इसलिए उनको पृथक व अलग रखने का कोई आधार
नहीं है।
(2) कि अल्पसंख्यकों के विषय में एक सलाहकार समिति होगी।
जिसमें अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व होगा और वे उसमें अपने लिए
आवश्यक बचाव के उपाय करने के लिए आवाज उठा सकेंगे।
दूसरा तर्क बहुत ही बेकार है। इसके कारण स्पष्ट है। सलाहकार समिति की स्थिति तथा शक्तियों को निर्धारित नहीं किया गया है। अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधियों की संख्या निश्चित नहीं है। सलाहकार-समिति के निर्णयों को केवलमात्र बहुलमत द्वारा ही लिया जाना है। अंत में, सलाहकार-समिति संविधान-सभा की ही मात्र प्रतिच्छाया होगी, उससे अधिक कुछ नहीं हो सकती। संविधान सभा में अनुसूचित जातियों के समस्त प्रतिनिधि कांग्रेस पार्टी से संबंधित है और वे अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। अतएव वे कांग्रेस पार्टी के आदेश के अधीन हैं, वे उसी के आदेश का पालन करेंगे। उनमें से जिन व्यक्तियों को सलाहकार समिति में रखा जाएगा, वे उसी पार्टी के आदेश का पालन करेंगे। वे संविधान सभा में या सलाहकार-समिति में अनुसूचित जातियों के वास्तविक दृष्टिकोण को प्रस्तुत नहीं कर सकते।
मंत्रीमंडलीय आयोग के सदस्यों द्वारा अनुसूचित जातियों को पृथक तथा स्वतंत्र प्रतिनिधित्व देने में अपनी असफलता के औचित्य को सिद्ध करने के लिए अपने बचाव में जो मुख्य बात कहीं गई वह यह है कि विगत चुनावों में अनुसूचित जातियों की सीटों को कांग्रेस ने जीता था। उनके बचाव का यह तर्क भी ठीक नहीं उतरता। यह सच है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जातियों की सीटों को जीता था। परंतु इसका उत्तर यह है कि इस चुनाव के परिणामों को विभिन्न बातों के कारण आधार नहीं माना जाना चाहिए।