प्रस्तावों की समीक्षा
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राजनीतिक तंत्र, का निर्माण किया है। काश, केवल उनको सफलता मिल जाती.....। यदि कांग्रेस वास्तव में भारत के राष्ट्रीय जीवन के सभी मुख्य घटकों/अंगों के लिए बोल सकती, जैसा कि वह बोलने का दावा करती है, तब उनकी मांगे चाहे जितनी बड़ी होती, तब भी हमारी समस्या अनेक प्रकार से आज की अपेक्षा बहुत आसान हो जाती। यह सच है कि ब्रिटिश भारत में वह (कांग्रेस) संख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा अकेला दल है परंतु समस्त भारत के लिए बोलने के उसके दावे की वास्तविकता को भारत के जटिल राष्ट्रीय जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण घटकों द्वारा पूर्णतया अस्वीकार कर दिया है। ये अन्य लोग केवल स्वयं को संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक मानने के अपने अधिकार पर ही जोर नहीं देते बल्कि वे भारत की किसी भी भावी नीति में पृथक घटक के रूप में माने जाने का दावा भी करते हैं। इन घटकों में प्रमुख मुस्लिम समुदाय है। भौगोलिक निर्वाचन-क्षेत्रों में बहुमत द्वारा निर्वाचित संविधान सभा द्वारा बनाए गए संविधान से उनका कोई मतलब नहीं। वे यह दावा करते हैं कि किसी भी संवैधानिक विचार विमर्श में, बहुमत की कार्यवाही के विरूद्ध उनके अधिकार को एक अलग अस्तित्व के रूप में माना जाए। यही बात उस बड़े घटक पर लागू होती है जिसे अनुसूचित जातियों के रूप में जाना जाता है। उसकी ओर से श्री गांधी के महत्वपूर्ण प्रयास के बावजूद, ये लोग यह महसूस करते हैं कि एक समुदाय के रूप में वे हिन्दू समुदाय से, जिसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस करती है, बाहर हैं।’’
-माननीय श्री एल.एस.एमरी.सेक्रेट्री ऑफ स्टेट फॉर इंडिया, द्वारा 14 अगस्त, 1940 को हाउस ऑफ कामन्स में दिए गए भाषण से उद्धरण।
‘‘इन समस्त कारणों को विस्तृत रूप में दोहराए बिना, मैं आपको यह स्मरण कराना चाहता हूं कि महामहिम की सरकार ने उस समय यह स्पष्ट किया थाः-
(क) युद्ध के बाद संपूर्ण स्वतंत्रता का उनका प्रस्ताव एक ऐसे संविधान के निर्माण पर सशर्त रखा गया था जिसे भारत के राष्ट्रीय जीवन के मुख्य घटकों द्वारा स्वीकार किया जाए तथा महामहिम की सरकार के साथ आवश्यक संधि व्यवस्था की बातचीत द्वारा स्वीकृत हो।
(ख) युद्ध के दौरान, संविधान में कोई ऐसा परिवर्तन करना असंभव है, जिसका यह अभिप्राय हो कि केवल ऐसी ‘राष्ट्रीय सरकार’ ही जैसी आपने सुझाई है, केन्द्रीय सभा के प्रति उत्तरदायी बनाई जा सकती है।
इन शर्तों का उद्देश्य इस बात को सुनिश्चित करना है कि दलित वर्गों के तथा भारतीय रिसायतों के प्रति संधि दायित्वों तथा जातीय धार्मिक अल्पसंख्यकों के हित की रक्षा करने के लिए कर्तव्य को पूरा करें।’’