2. मंत्रिमंडलीय शिष्टमंडल तथा अछूत - Page 158

प्रस्तावों की समीक्षा

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लिए अंतिम चुनाव के लिए खड़ा होना भी आवश्यक होता है। अछूतों के लिए दोहरे चुनाव के खर्च के भार को वहन करने की अक्षमता के कारण प्राथमिक चुनाव के लिए अछूत समुदायों के सदस्यों को खड़ा करना बहुत कठिन होता है। इस तथ्य को कि केवल 43 सीटों के लिए ही चुनाव हुए, इस निष्कर्ष का आधार नहीं बनाया जा सकता कि अछूत कांग्रेस से पृथक होने का दावा नहीं करते।

( ii ) कांग्रेस से ही यह पूछा जाना चाहिए कि उसने प्राथमिक चुनावों में प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में चार उम्मीदवार क्यों नहीं खड़े किए। क्योंकि यदि कांग्रेस अछूतों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है तो उसे प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस टिकट पर चार उम्मीदवारों से अधिक उम्मीदवार खड़े करने चाहिए थे और 151 चुनाव क्षेत्रों में से प्रत्येक में प्राथमिक चुनाव कराने चाहिए थे और अंतिम चुनाव में आने से अन्य प्रत्येक दल को बाहर कर देना चाहिए था। कांग्रेस ने यह नहीं किया। इसके विपरीत 43 प्राथमिक चुनावों में भी कांग्रेस ने प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में केवल एक उम्मीदवार

खड़ा किया क्योंकि उसका प्रथम चार के अंदर आने और हिन्दू मतों से अंतिम चुनाव में जीतने की कम संभावना थी। इससे यह पता चलता है कि कांग्रेस यह जानती थी कि अछूतों का कांग्रेस में विश्वास नहीं था।

( iii ) केवल 1937 में ही अछूतों को पहली बार मतदान करने का अधिकार मिला था और 1937 के बाद ही अछूतों ने अपने आपको चुनाव कराने के लिए संगठित करना शुरू किया था। कांग्रेस चुनावों में अनुसूचित जाति संघ से बढ़कर सिद्ध हुई, केवल इस बात से यह निष्कर्ष निकाल लेना गलत है कि अछूत कांग्रेस के साथ हैं। मंत्रिमंडलीय आयोग को चुनावों के परिणामों से अनुसूचित जाति संघ के विपरीत कोई निष्कर्ष निकालते समय चुनाव लड़ने में अनुसूचित जाति संघ तथा कांग्रेस की असमान शक्ति को ध्यान में रखना चाहिए था।

मंत्रिमंडलीय आयोग द्वारा अपने निर्णयों के औचित्य में बताए गए अन्य आधारों की निरर्थकता

  1. मंत्रिमंडलीय आयोग के सदस्यों ने तर्क दिया कि डाक्टर अम्बेडकर का समर्थन अनुसूचित जातियों में केवल बम्बई प्रेसिडेंसी तथा मध्य प्रांत तक ही सीमित था। इस बयान का कोई आधार नहीं है। अनुसूचित जाति संघ अन्य प्रांतों में भी कार्य कर रहा है और उसने उसमें उल्लेखनीय व महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। वह सफलता यदि अधिक बड़ी नहीं तो बम्बई तथा मध्य प्रांत के समान ही बड़ी है। इस बयान को देते समय, आयोग ने उस एकाकी विजय को ध्यान में नहीं रखा है जो डा.अम्बेडकर ने संविधान सभा के चुनाव में प्राप्त की थी। वह बंगाल प्रांत विधान