प्रस्तावों की समीक्षा
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जो कि श्री गांधी द्वारा उनके ऊपर अपने आमरण अनशन से बलात लादा गया था। हिन्दू इसका विरोध अवश्य करेंगे। इस आलोचना के उत्तर में कि उनको हिन्दू बहुमत की दया पर छोड़ दिया गया है, मंत्रिमंडलीय आयोग, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के साधन के रूप में, अल्पसंख्यकों पर एक सलाहकार समिति बनाने के अपने प्रस्ताव का प्रचार करता रहा है। जो भी व्यक्ति सलाहकार समिति की शक्तियों तथा गठन की जांच करेगा, पायेगा कि यह समिति बेकार से भी बदतर है।
( i ) वर्तमान रचना में यह संविधान सभा का निस्तेज प्रतिबिम्ब है। हिन्दुओं का इस पर भी संविधान सभा की तरह ही अधिकार होगा।
( ii ) यह तथ्य कि संविधान सभा में तथा कांग्रेस की सद्भावना द्वारा निर्वाचित सलाहकार समिति में कुछ संख्या अछूत सदस्यों की होगी, उनके लिए कुछ भी सहायक नहीं हो सकता, क्योंकि संविधान सभा तथा सलाहकार समिति के अछूत सदस्य केवल हिन्दुओं की ही कठपुतली हैं।
( iii ) सलाहकार समिति द्वारा अल्पसंख्यकों की रक्षा से संबंधित प्रश्नों पर निर्णयों को मात्र बहुमत पर ही छोड़ दिया जाता है, जिसका अर्थ यह है कि निर्णय सवर्ण हिन्दुओं द्वारा लिया जाएगा और उसे अल्पसंख्यकों पर लादा जाएगा।
( iv ) सलाहकार समिति के निर्णय भले अनुकूल ही हों, पर वे सिफारिश ही होंगे, उससे अधिक नहीं। वे संविधान सभा पर बाध्यकारी नहीं हैं।
- सलाहकार समिति की युक्ति, इस प्रकार से, यदि एक छल नहीं तो एक कपट है और इस पर यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि अल्पसंख्यकों के हित के लिए हिन्दू बहुमत द्वारा जो शरारत की जाती है, वह उसका विरोध करेगी। हिन्दु बहुमत की एकमात्र अछूतों के प्रति ही दुर्भावना है और यह प्रतीत होता है कि उन्होंने अछूतों को उस राजनीतिक सुरक्षा से वंचित रखने का निश्चय कर लिया है जो कि बहुमत के कारण मिलनी चाहिए। यह बात 25 जून, 1946 को कांग्रेस द्वारा सम्बोधित पत्र (पत्राचार 6861 में मद 21) से प्रकट होती है। उस पत्र में कांग्रेस ने यह पक्ष लिया है कि अछूत अल्पसंख्यक नहीं हैं। यह एक विस्मयकारक तर्क है। क्योंकि ‘‘हरिजन’’ नामक 21 अक्तूबर, 1939 के साप्ताहिक पत्र में श्री गांधी ने स्वयं स्वीकार किया है कि भारत में अछूत ही केवल वास्तविक अल्पसंख्यक हैं। इस प्रकार कांग्रेस ने पूर्ण कलाबाजी की है। अब कांग्रेस द्वारा लिया गया आधार, भारत सरकार अधिनियम 1935 में निहित सिद्धांतों के विपरीत है जो उनको अल्पसंख्यक मानते हैं। इस कलाबाजी द्वारा क्या शरारत अपेक्षित है, इसे जानना संभव नहीं है। यदि कांग्रेस अछूतों को यह नहीं मानती कि वे अछूत हैं, तो यह संभव है कि संविधान