146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
सभा उनको वह सुरक्षा प्रदान करने से इंकार कर दे जो वह अन्य अल्पसंख्यकों को देने के लिए सहमत है। इसलिए सलाहकार समिति अछूतों को खतरे से नहीं बचा सकती।
अतएव संसद को यह देखने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए कि अछूतों की स्थिति जोखिम में न पड़ जाए। संसद को यह केवल इस कारण नहीं करना चाहिए क्योंकि उसने वचन दिए हैं, बल्कि इस तथ्य के कारण भी करना चाहिए कि संविधान सभा के वादविवाद की पुष्टि नहीं की जाती।
संसद क्या कर सकती है? अछूत यह चाहेंगे कि अंतरिम सरकार के संबंध में उनके साथ जो गलती की गई है उसका सुधार किया जाए। वे अपना कोटा निश्चित करना चाहेंगे। वे यह चाहेंगे कि कार्यकारिणी परिषद में उनके प्रतिनिधि नामित किए जाएं। ये अधिकार कोई नए दावे नहीं हैं। वे अछूतों के प्रदत्त अधिकार हैं जिन्हें 1945 की शिमला कांफ्रेंस में मान्यता दी गई थी। वे यह महसूस करते हैं कि इस गलती को सुधारना अब कठिन हो सकता है, परंतु यदि परिस्थितियां बदलें और सरकार का पुनर्गठन हो तो वे यह आशा करते हैं कि संसद इस गलती को ठीक करने के लिए महामहिम की सरकार पर दबाव डाले।
अछूतों को उनकी राजनीतिक सुरक्षा से वंचित रखने के लिए दृढ़ संकल्प सवर्ण हिन्दुओं के बहुमत व प्रभाव वाली संविधान सभा से अछूतों को पहुंची हानि व क्षति से बचाने के लिए काफी किया जा सकता है। इस हानि को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैंः
( i ) महामहिम की सरकार पर यह दबाव डाला जाए कि वह यह घोषणा करे कि वह अछूतों को अल्पसंख्यक मानती है।
कांग्रेस ने अपने 25 जून, 1946 के पत्र (पृष्ठ 6861 में मद 21) में जो आधार/ पक्ष लिया है उसकी दृष्टि से यह आवश्यक है। यह इसलिए और भी आवश्यक है क्योंकि कांग्रेस को वायसराय ने, दिनांक 27 जून, 1946 के उत्तर में (पत्राचार संख्या 6861 में मद 38) कांग्रेस के इस विवाद को कि अछूत अल्पसंख्यक नहीं हैं निश्चित रूप में नकारने में टालमटोल की है। यदि सरकार पर घोषणा करने के लिए अब दबाव नहीं डाला गया तो अछूतों को दो प्रकार से हानि होगी।
(क) हिन्दुओं के प्रभुत्व वाली संविधान सभा उनको अल्पसंख्यक का अधिकार देने से इनकार कर देगी।
(ख) महामहिम की सरकार इस आधार पर उनके बचाव के लिए आगे न आने को स्वतंत्र होगी कि वह अछूतों को अल्पसंख्यक मानने के लिए वचनबद्ध नहीं है।