1. राजनीतिक शिकायतें - Page 25

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

केन्द्रीय सभा में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि माननीय राय बहादुर एन. शिवराज को अनुसूचित जातियों की ओर से बोलने का अवसर बहुत कठिनाई से मिला था जबकि पांच या छः मुस्लिम सदस्य मुसलमानों के बारे में आसानी से बोल सके। 7. इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि सभा में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व में वृद्धि की जाए। किन्तु यह तभी हो सकता है जब नामांकित गैर-सरकारी सीटें रिक्त हों। जब कभी ये सीटें रिक्त हों, तो इस बात की आवश्यकता है कि इन सभी रिक्त स्थानों में अनुसूचित जातियों का नामांकन करके, विधान सभा में उनकी सीटों में वृद्धि की जाए।

2. केन्द्रीय कार्यपालिका में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व
  1. भारत सरकार केन्द्रीय कार्यपालिका में अनुसूचित जातियों को प्रतिनिधित्व के अधिकार की मान्यता देने में बहुत संकोच करती रही है। यह स्थिति अनुसूचित जातियों के लिए बराबर बनी रहती है। उनका विचार है कि अतीत में उनकी राजनीतिक स्थिति कुछ भी क्यों न रही हो, गोल-मेल सम्मेलन के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति मुसलमानों की स्थिति के समान हो गई, और यदि मुसलमानों को केन्द्रीय कार्यपालिका में प्रतिनिधित्व का कोई अधिकार है तो ऐसा अधिकार अनुसूचित जातियों को भी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस धारणा का ठोस आधार है। गोल-मेज सम्मेलन में अनुसूचित जातियों की यह मांग थी कि प्रतिनिधित्व केवल मुसलमानों तक ही सीमित न करके इस कानून के उपबंध अनुसूचित जातियों के लिए भी लागू हों ताकि उन्हें भी पर्यात्त प्रतिनिधित्व प्राप्त हो सके। हिन्दुओं का विचार इस मांग के विरूद्ध नहीं था। हिंदुओं ने यही कहा कि यह परिपाटी पर छोड़ दिया जाना चाहिए। अन्ततोगत्वा एक समझौता किया गया और यह सहमति हुई कि प्रान्तों के गर्वनरों और भारत के गवर्नर-जनरल को दिए जाने वाले निर्देशों में ऐस प्रावधान भी होना चाहिए जो उन पर यह दायित्व सौंपे कि महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित किए जाने का प्रयास किए जाएं। यद्यपि समुदायों के बारे में स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया था, तथापि इसमें कोई संदेह नहीं था कि ‘‘महत्वपूर्ण अल्पसंख्यकों’’ के प्रावधान में अनुसूचित जातियां भी सम्मिलित की गई थी। अंत में भारत सरकार ने इस दायित्व को स्वीकार कर लिया और मंत्रिमंडल में अनुसूचित जातियों को प्रतिनिधित्व दिया।

  2. परंतु यह भी सच है कि उनके अधिकार को मान्यता देने में देरी के कारण