राजनीतिक शिकायतें
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‘‘दलित वर्गो1 के सदस्यों की भर्ती के पूर्ण अभाव के बारे में, जो उपलब्ध
सूचना से बिलकुल स्पष्ट है, विभाग को चिंता है।’’
उपभोक्त उद्धरण ज्ञापन संख्या 4/5/38 एस्ट्स एस. दिनांक 1 जून, 1939 से लिया गया है तथा उसमें उस स्थिति का रिकार्ड है जो उस तारीख को विद्यमान थी।
यह कैसे हुआ कि अन्य समुदायों ने भारत सरकार द्वारा नियंत्रित सेवाओं में स्थान पा लिया? अनुसूचित जातियों को अलग करने के क्या कारण हैं? ये कारण सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के इन नियमों और तरीकों के अंतर में मिल सकते हैं जो भारत सरकार ने भारत की अनुसूचित जातियों और अन्य अल्प-संख्यक समुदायों के संबंध में अपनाए हैं।
केन्द्र द्वारा नियंत्रित सेवाओं में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का नियम 1925 में लागू किया गया था जब कि भारत सरकार ने 10 मार्च, 1923 को केन्द्रीय विधान सभा में लोक सेवाओं के सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर श्री नायर का प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसमें यह शिकायत की गई थी कि लोक सेवा पर हिंदुओं द्वारा एकाधिकार है, और विशेषकर उन पर ब्राह्मणों का अधिकार है तथा अन्य संप्रदायों को इन सेवाओं में स्थान पाने में बहुत कठिनाई हुई है। इस प्रस्ताव के अनुसरण में भारत सरकार ने एक तरीका अपनाया जिसके अनुसार सांप्रदायिक असमानताओं को दूर करने के लिए सभी सीधी भर्ती के एक तिहाई स्थायी पदों को आरक्षित कर दिया गया।
लोक सेवाओं में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की नीति को प्रभावकारी बनाने के तरीकों से गैर-हिन्दू संप्रदायों को संतुष्ट नहीं किया जा सका। यह मामला गोल-मेज सम्मेलन में उठाया गया और यह मांग की गई कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अधिक प्रभावकारी तरीका अपनाया जाए। यह मांग सेक्रेटरी ऑफ स्टेट तथा भारत सरकार द्वारा स्वीकार कर ली गई तथा गृह विभाग के संकल्प संख्या एफ 14-17-8-33 दिनांक 4 जुलाई, 1934 द्वारा इसे प्रभावी बनाया गया।
यह ऐसा संकल्प है जो अब लागू है तथा ऐसा महाधिकार पत्र है जो देश की लोक सेवाओं के सभी संप्रदायों को न्याय दिलाता है। इस संकल्प के उपबंधों का उल्लेख करना अत्यंत आवश्यक है। इससे यह विदित होगा कि लोक सेवाओं में अन्य अल्पसंख्यक संप्रदायों को इतना अधिक प्रतिनिधित्व क्यों मिला है जबकि अनुसूचित जातियों को बिल्कुल भी प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। इस संकल्प में दो आधारभूत उपबंध हैं जो 1923 के पुराने संकल्प की तुलना में बिल्कुल नए हैं-