20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
पद नामांकन द्वारा दिए गए। मुसलमानों ने 1920-42 के दौरान प्रतियोगिता
द्वारा आई.सी.एस की नियुक्तियां में केवल 35 पद प्राप्त किए, परंतु उन्हें
नामांकन द्वारा 74 पद दिए गए। सिक्खों को प्रतियोगिता द्वारा केवल 5 पद
मिले, परंतु उन्हें नामांकन द्वारा 6 पद दिए गए। अनुसूचित जातियों को
प्रतियोगिता से कोई पद नहीं मिला, परंतु उन्हें नामांकन द्वारा केवल एक
पद दिया गया। इस स्थिति में यह विदित होता है कि अनुसूचित जातियों
की दशा शोचनीय रही है और सरकार इस परिणाम के लिए उत्तरदायी
है, जो अन्य समुदायों के लिए सद्भावपूर्ण स्थिति बनाए रखने के निमित
प्रयत्नशील है जबकि अनुसूचित जातियों को सही स्थिति दिलाने के लिए
प्रयत्नशील नहीं है।
- अनुसूचित जातियों की दशा शोचनीय ही नहीं, अपति असहनीय भी है। यह स्थिति भारत सरकार की वर्तमान नीति के फलस्वरूप पैदा हुई है जिसके अंतर्गत लोक-सेवाओं में अनुसूचित जातियों की भर्ती की संख्या नियम द्वारा निर्धारित न की जाकर नियुक्त करने वाले अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दी जाती है, जबकि अन्य अल्पसंख्यकों की नियुक्ति का अनुपात नियमों में निर्धारित है। नियुक्त करने वाले अधिकारी अधिकांशतया हिंदू होते हैं और उनसे यह आशा करना संभव नहीं है कि वे अपने इस विवेक का लाभ अनुसूचित जातियों को देंगे। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि अनुसूचित जाति के हितों की अवहेलना होती रहेगी और जब तक वर्तमान कार्य-पद्धति जारी है तब तक अन्य समुदायों के हितों की पूर्ति हेतु अनुसूचित जातियों के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा। भारत सरकार को चाहिए कि देर किए बिना अनुसूचित जातियों की स्थिति को समान बनाए और-
(1) यह घोषित करे कि अनुसूचित जातियां अन्य समुदायों के
समान सेवाओं के उद्देश्य की पूर्ति के लिए अल्पसंख्यक हैं।
(2) आई.सी.एस. के वार्षिक रिक्त स्थानों के लिए तथा उन अन्य
केन्द्रीय सेवाओं के लिए जहां अखिल भारतीय स्तर पर भर्ती अथवा स्थानीय
तौर पर भर्ती की जाती है अनुसूचित जातियों का अनुपात 13.5» निर्धारित
किया जाना चाहिए। वे इस समता तथा न्याय की दृष्टि से इस आरक्षण के
अधिकारी हैं।
जब तक यह नहीं किया जाता, तब तक अनुसूचित जातियों को लोक सेवाओं में उनका स्थान कभी नहीं मिलेगा।
- अनुसूचित जातियों की कठिनाई यह है कि उन्हें अल्पसंख्यक वर्ग घोषित नहीं किया गया है। यह आवश्यक है कि उनके मार्ग से इस अनुरोध को हटा दिया जाए।