22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
मृत्यु से बचाया जा सके। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि शब्द ‘पर्याप्त’ जनसंख्या के अनुपात से कम कुछ भी नहीं था। अतः हिन्दू अनुसूचित जातियों के दाव का विरोध नहीं कर सकते और वास्तव में वे ऐसा नहीं करते। अनुसूचित जातियों के दावे का विरोध करने वाली पार्टी भारत सरकार है और कोई नहीं। राय बहादुर एन. शिवराज, विधान सभा सदस्य, द्वारा कटौती के प्रस्ताव पर मार्च, 1942 में केन्द्रीय विधान सभा में यह प्रश्न उठाया गया और इस प्रश्न पर बहस की गई। इस बहस में अनुसूचित जातियों को अल्पसंख्यक घोषित करने और उन्हें सेवाओं में उनका स्थान दिलाने के मुद्दे उभर कर आए। इस प्रस्ताव को मुसलमानों ने स्वीकार किया और इस प्रस्ताव के समर्थक यूरोपीय, एंग्लो-इंडियन तथा सिख भी रहे। केवल एक व्यक्ति को छोड़कर, हिन्दुओं ने भी इसी प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। फिर भी, सरकार के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। यह इस कहानी का सबसे दुःखद भाग है। भारत सरकार ने कहा है कि वह अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए न्यासधारी है। न्यासधारी होने के नाते सरकार को अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा की अपेक्षा अनुसूचित जातियों के अधिकारों की सुरक्षा करनी चाहिए। भारत सरकार के लिए यह बहाना हो सकता था कि लोक सेवाओं में भर्ती के मामले में अनुसूचित जातियों के भाग के आवंटन के प्रति हिन्दू आपत्ति उठा सकते हैं। परंतु ऐसे बहाने की कोई गुंजाइश नहीं है। क्या यह मानना गलत होगा यदि यह कहा जाए कि अनुसूचित जातियों के शत्रु हिन्दू नहीं हैं, अपितु भारत सरकार उनकी वास्तविक शत्रु है?
- इसका क्या कारण है कि भारत सरकार अनुसूचित जातियों के दावे का विरोध करती है। माननीय रायबहादुर एन.शिवराज, विधान सभा सदस्य, द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव के बारे में माननीय गृह मंत्री का भाषण इस बात का संकेत है। इसका कारण यह है कि अनुसूचित जातियों में काफी शिक्षित लोग नहीं है। यह भी कहना चाहिए कि यह कोई विश्वास दिलाने वाला कारण नहीं है। सर्व प्रथम 1934 के संकल्प के पैरा 3 में दिया गया यह एक पुराना कारण है। इसमें किसी भी ऐसी प्रगति के विवरण नहीं दिए गए हैं जो गत आठ वर्षों में की गई है। दूसरे यह वक्तव्य 1934 के लिए भी सही नहीं था। 1942 के लिए भी यह वक्तव्य नितांत असत्य है। वास्तव में अनुसूचित जातियों के कालेज के विद्यार्थियों की गणना निजी रूप से 1939-40 के आसपास की गई थी और तब अनुसूचित जातियों के स्नातकों की कुल संख्या लगभग 400 से 500 तक पाई गई थी। तीसरे, यदि यह तथ्य सही भी है, तो भी अनुसूचित जातियों को अल्पसंख्यक घोषित करने में कोई अवरोध नहीं है और इस हेतु उनके अनुपात को निर्धारित करने में यह स्थिति विरोध पैदा नहीं करती। यदि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षिति रिक्त स्थानों के वार्षिक अनुपात में किसी वर्ष न्यूनतम