34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अध्याय-3
अन्य शिकायतें
1. प्रचार के मामले में लापरवाही
यह सर्वविदित है कि भारत सरकार अधिकांशतया इस बात में व्यस्त रहती है कि उन विभिन्न व्यक्तियों और दलों के कथनों और कार्यों का प्रचार करे जो भारत में क्रियारत मुख्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस बात के उदाहरण के लिए मैं ‘‘इंडिया एंड द एग्रेसर’’ (1935-40 के बीच भारतीय विचारधारा की प्रवृत्ति) नामक ग्रंथ का उल्लेख करना चाहूंगा जो भारत सरकार के लोग सूचना ब्यूरों द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस ग्रंथ का नाम कुछ भ्रामक है। इसका आक्रामक (एग्रेसर) से कोई संबंध नहीं है। यह देश में राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के कथन और कार्यो का संकलन है तथा भारत के बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के विचारों का पूर्ण सारांश प्रस्तुत करता है।
इस ग्रंथ का सबसे अधिक दोषपूर्ण भाग यह है कि इसमें अनुसूचित जातियों के कथनों और कार्यों के प्रति पूर्ण लापरवाही दिखाई गई है। 940 पृष्ठों में 158 पृष्ठ कांग्रेस और 85 पृष्ठ मुसलमानों के लिए दिए गए हैं। हिन्दू महासभा और हिन्दू लीग के लिए लगभग 10 पृष्ठ दिए गए हैं। लिबरल फेडरेशन को 16 पृष्ठ दिए गए हैं। सिखों को 6 से अधिक पृष्ठ दिए गए हैं। भारतीय ईसाइयों को 2 से अधिक पृष्ठ दिए गए हैं, जबकि अनुसूचित जातियों को 3 पृष्ठों में निपटाया गया है। सबसे अधिक आश्चर्यजनक बात यह है कि अनुसूचित जातियों के लिए 3 पृष्ठ में जो सामग्री दी गई है वह भी महत्वहीन प्रकृति की है। इसमें कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया गया है जो इस अवधि में घटी हैं तथा अनुसूचित जातियों के प्रमुख व्यक्तियों ने जो महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं उनकी उपेक्षा कर दी गई है। मैं केवल एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा अर्थात धर्म-परिवर्तन का आंदोलन। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक ऐसा आंदोलन था जिसने हिन्दू समाज की जड़ों को हिला दिया तथा समस्त विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। इस ग्रंथ में अनुसूचित जातियों के दिखाऊ प्रचार के बारे में सेंट मेरी कॉलेज,