अन्य शिकायतें
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कुरस्योंग क जिक्र करना पर्यात्त होगा। एक बार इस कॉलेज ने अनुसूचित जातियों की समस्याओं से संबंधित 507 पृष्ठ की सामग्री प्रकाशित की। 1935-40 की अवधि के दौरान अनुसूचित जातियों को प्रभावित करने वाली और उनसे उद्भूत अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग एवं घटनाएं सामने आयी। स्वयं मैंने भी अनुसूचित जातियों के बारे में अनेक घोषणाएं की। परंतु इनमें से किसी का भी उल्लेख इस ग्रंथ में नहीं है।
यह सच है कि यह ग्रंथ केवल सरकारी प्रयोग के लिए है। परंतु मेरे विचार से इस तथ्य से इस ग्रंथ का महत्व कम नहीं हो जाता है। यह निर्विवाद सत्य है कि अधिकारियों की सोच ही अधिकांशतया वह दिशा निर्धारित करती है जिससे राज्य के आधार पर राज्य की नीति का निर्धारण किया जाता है। इससे वह महत्व भी सुनिश्चित होता है जो उसे सम्प्रदायों के हितों के मुद्दों को देना चाहिए। यह भी निर्विवाद सत्य है कि कर्मचारी की प्रवृत्ति और सोच इस प्रकार की सामग्री द्वारा निर्धारित होती है जो उसे प्रस्तुत की जाती है और ये तथ्य इसी प्रकार के ग्रंथ में दिए जाते हैं। सरकार द्वारा किसी उद्देश्य के लिए सरकारी प्रकाशन में किया जाने वाला प्रचार उसके द्वारा उतने महत्व का समझा जाएगा जो सरकार उसके साथ सम्बद्ध करती है तथा अलग-अलग समुदायों की आवश्यकताओं और दावों का मूल्यांकन करने के लिए उसका मार्गदर्शन करेगा। इस विचार की दृष्टि से यह ग्रंथ निश्चय ही केन्द्रीय सचिवालय और प्रांतीय सरकारों में काम करने वाले अधिकारियों और यहां तक कि सेके्रेटरी ऑफ स्टेट में यह छाप छोड़ता है कि भारत सरकार अनुसूचित जातियों को नगण्य समझती है जिनके बारे में परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। यही वह प्रभाव है जो इस ग्रंथ से उभरा है और यह बात संसद में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट द्वारा दिए गए भाषण से स्पष्ट है जिसमें मुसलमानों का जोरदार तथा ठोस उल्लेख किया गया है जबकि अनुसूचित जातियों के संदर्भ निक्षिप्त वाक्यांशों में दिए गए हैं। यह भारी भूल हैं जो उन अनुसूचित जातियों के लिए की गई है जिन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति में ऐसे सबसे जटिल समय में धक्का लगा है जब वे लोग संघर्षरत थे क्योंकि सरकार की ओर से उनके मुद्दे को असंतुलित ढंग से प्रस्तुत किया गया है। मैं बात पर जोर देना चाहूंगा कि लोक सूचना ब्यूरों को इस ग्रंथ का पूरक ग्रंथ निकालना चाहिए जिसमें अनुसूचित जातियों के आंदोलन तथा उनके नेताओं की घोषणाओं का समावेश हो।
निश्चय ही सरकार कह सकती है कि वह पार्टियों और समुदायों के प्रचार कार्य के लिए बाध्य नहीं है तथा पार्टियों और समुदायों को स्वयं अपना प्रचार-कार्य करना चाहिए। परंतु यहाँ बात दूसरी है। जैसा कि मैंने बताया, भारत सरकार स्वयं-प्रचार-कार्य करती है इसलिए वह सभी पार्टियों को प्रचार-कार्य में समान समझने के लिए बाध्य