3. अन्य शिकायतें - Page 51

36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

है और उसे देश में चलने वाले आंदोलनों और ताकतों के बारे में ठीक और सही तस्वीर प्रस्तुत करनी चाहिए।

2. सरकारी ठेकों में बंद-द्वार
  1. सार्वजनिक निर्माण कार्यों का अधिकतर काम सरकारी विभाग द्वारा न किया जाकर ठेकों के माध्यम से कराया जाता है। सामान्य काल की यही प्रणाली है। युद्ध के समय सरकार के लिए ठेके की पद्धति द्वारा किया जाने वाला कार्य कई सौ गुना बढ़ गया है। मैं केवल केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के बारे में बता सकता हूं। केन्द्रीय लोक निर्माण द्वारा स्वीकृत ठेकेदारों की संख्या 1,171 है। मुझे बताया गया है कि इन ठेकेदारों में से केवल एक ठेकेदार अनुसूचित जाति का है। शेष सभी ठेकेदार हिन्दू, सिख और मुसलमान है। सरकार के लिए यह संभव है कि इन सभी बातों को इस प्रकार व्यवस्थित करे कि ठेके की पद्धति सभी समुदायों को लाभ उठाने के लिए

खुली रहे। अनुसूचित जातियों के ऐसे अनेक लोग हैं जिन पर सरकारी ठेका संपन्न करने के लिए विश्वास किया जा सकता है। अनुसूचित जाति के अनेक सदस्य पहले ही से हिन्दू, मुसलमान और सिख ठेकेदारों के नौकरों के रूप में काम कर रहे हैं। इसका परिणाम यह है कि हिन्दू, मुसलमान अथवा सिख ठेकेदार लाभ उठा रहे हैं जबकि अनुसूचित जाति के लोग केवल मजदूरी पर ही काम कर रहे है।

  1. इसमें अधिक कठिनाई नहीं होगी कि स्वीकृत ठेकेदारों की सूची में अनुसूचित जातियों के कुछ लोगों को शामिल कर लिया जाए। परंतु इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें ठेका दिया जाए। सरकारी ठेकों के बारे में दो नियम हैः-

(1) सामान्यतया उसी ठेकेदार को ठेका दिया जाता है जिसका टेंडैंर

सबसे कम हो_

(2) सरकार इस बात के लिए बाध्य नहीं है कि सबसे कम लागत

वाला टेंडर ही स्वीकार किया जाए।

  1. इसलिए यह प्रभारी अधिकारी के स्वविवेक पर निर्भर करता है कि कोई ठेका किसी विशेष ठेकेदार को दिया जाए अथवा नहीं। इस स्वविवेक के अनुसूचित जाति के ठेकेदार के पक्ष में प्रयोग किए जाने की संभावना नहीं है। उसका टेंडर सबसे कम लागत का हो सकता है परंतु अधिकारी जातिगत पक्षपात के कारण दूसरे नियम का पालन करते हुए अनुसूचित जाति के व्यक्ति का टेंडर अस्वीकार कर सकता है क्योंकि वह अधिकारी बाध्य नहीं है कि सबसे कम लागत वाला टेंडर ही स्वीकार