40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
निम्न जातियों को शिक्षित करने का प्रश्न
‘‘पैरा 21-इन तथ्यों से यह व्यावहारिक निष्कर्ष निकलता है, जो वर्षों के हमारे अनुभवों पर आधारित हैं, कि उन गरीब उच्च वर्गो के बच्चों के लिए शिक्षा के चौड़े द्वार खोल दिए जाने चाहिए जो हमसे शिक्षा पाने के लिए लालायित है। परंतु यहां उलझन में डालने वाला एक प्रश्न उठता है जिसकी ओर ध्यान देना जरूरी है। यदि गरीब लोगों के बच्चे निःशुल्क सरकारी संस्थाओं में प्रवेश पा सकते हैं तो सभी दलित जातियों यथा ढेड, महार आदि को उनके परिसर में अधिक संख्या में एकत्र होने से कौन रोक सकता हैं?’’
हिन्दुओं का सामाजिक भेदभाव
‘‘पैरा 22- इस बात में बहुत कम संदेह है कि यदि बम्बई में इस चौथे वर्ग की श्रेणी तैयार करनी है तो उन्हें ऐसे प्रोफेसरों और अध्यापकों के प्रभाव के अधीन प्रशिक्षित किया जाए जो बोर्ड की सेवा में कार्यरत हैं और वे समाज के उच्च बौद्धिक लोग बन जायेंगे, और इस प्रकार योग्यताएं प्राप्त कर लेने पर उन्हें यह आकांक्षा करने से नहीं रोका जा सकता कि वे ऐसे उच्चतम पदों पर आसीन हों जो देशी लोगों के लिए खुले हैं- जज, ग्रेड जूरी और शांति के लिए महामहिम के आयोग के सदस्य। अनेक उदार व्यक्तियों का विचार है कि ब्रिटिश सरकार की इस अति संकुचित और कमजोर नीति से इस प्रकार की नियुक्तियों के परिणामस्वरूप हिन्दू समुदाय में भारी क्षोभ उत्पन्न होगा, और जाति के बंधनों पर खुलकर आक्रमण किय जाना चाहिए।’’
माननीय माउंट स्टुअर्ट एलफिन्सटोन का बुद्धिमत्तापूर्ण अवलोकन
‘‘पैरा 23-परंतु इसके साथ श्री एलफिन्सटोन के विवेकशील विचार है, जो भारत के सबसे उदार और खुले दिमाग के प्रशासक थे। उनका कहना है कि मिशन कार्यकर्ता निम्नतम जातियों में अपने सबसे श्रेष्ठ शिष्य पाते हैं, परंतु हमें इस बात के लिए सावधान रहना चाहिए कि हम उस प्रकार के लोगों को कैसे विशेष प्रकार का प्रोत्साहन प्रस्तुत करें। वे केवल सबसे अधिक तिरस्कृत ही नही माने जाते, परंतु समाज के बड़ी जनसंख्या वाले समुदायों में सबसे कम जनसंख्या वाले हैं तथा यह आशंका है कि यदि हमारी शिक्षा पद्धति की जड़ पहले उन्हीं लोगों में जमती है तो यह फिर कभी भी विस्तृत नहीं हो पाएगी और हम एक ऐसा नवीन वर्ग अपने सम्मुख पायेंगे जो ज्ञान में अन्यों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ होगा परंतु ऐसी जातियों द्वारा तिरस्कृत होगा और जो चाहेंगी कि हम उन्हें वरीयता प्रदान करें। इस प्रकार की स्थिति तब तो वांछनीय होगी जब हम अपनी सेना के बल पर अपनी शक्ति बनाए रखने को वरीयता