पीडि़त लोगों के प्रति सरकार का कर्त्तव्य
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देते अथवा जनसंख्या के एक भाग से सम्बद्ध हो जाते, परंतु और अधिक विस्तृत आधार पर इसकी नींव डालने के प्रत्येक प्रयास से ग्रह असंगत है।’’
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- ऐसा है अनुसूचित जातियों की ओर सरकारी विरोध जिसके आधार पर सरकार ने भारतीयों को शिक्षा देने की नीति बनाई है। यह नीति कड़ाई के साथ लागू की गई। महार (अछूत) बच्चे का एक मामला रिकार्ड किया गया है। उस बालक ने 1856 में भारत सरकार को यह प्रतिवेदन दिया था कि उसे धारवाड़ जिले के गवर्नमेंट स्कूल में दाखिल किया जाए। सरकार ने जो संकल्प जारी किया, वह इस प्रकार हैः-
‘‘पत्रव्यवहार में जो प्रश्न उठाया गया है, उसमें बहुत व्यावहारिक कठिनाई है।
‘‘1. इसमें कोई संदेह नहीं कि न्याय महार आवेदक के पक्ष में हैं_ और सरकार यह विश्वास करती है कि ऐसे भेदभाव हैं जो उसे धारवाड़ में शिक्षा के वर्तमान साधनों को उपलब्ध कराने से वंचित करते हैं, और आशा करती है कि ये शीघ्र दूर हो जायेंगे।
‘‘परंतु सरकार यह बात ध्यान में रखने के लिए बाध्य है कि वर्षों पुराने भेदभावों में हस्तक्षेप करना सरसरी तौर पर ठीक नहीं है। किसी एक अथवा कुछ व्यक्तियों के लिए ऐसा करना शायद शिक्षा को अधिक हानि पहुंचाना होगा। आवेदक को जो हानि है, वह ऐसी हानि नहीं है जिसकी उत्पत्ति इस सरकार के साथ हुई है और यह ऐसी हानि नहीं है जिसे सरकार आवेदक के पक्ष में सरसरी तौर पर दूर करने के लिए हस्तक्षेप कर सके जैसा कि आवेदक ने प्रार्थना की है।’’
वर्ष 1882 में, भारत सरकार ने शिक्षा-नीति की जांच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया था। इस कमीशन ने मुसलमानों में शिक्षा प्रसार के लिए कई महत्वपूण् ार् प्रस्ताव प्रस्तुत किए। परंतु इसने अछूतों के लिए कुछ नहीं किया। उस कमीशन ने जो कुछ भी किया, वह महज उनके इस मत की अभिव्यक्ति थी कि ‘‘सरकार को एक सिद्धांत स्वीकार कर लेना चाहिए कि किसी विद्यार्थी को गवर्नमेंट कॉलेज या स्कूल में जाति के आधार पर प्रवेश पाने से इनकार नहीं किया जाएगा, परंतु यह भी कहा कि इस सिद्धांत को ‘‘सावधानीपूर्वक लागू करना चाहिए।’’
जब विरोध की भावना समाप्त हुई, तो इसका स्थान लापरवाही और उपेक्षा ने ले लिया। इस लापरवाही और उपेक्षा ने शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, अपितु अन्य