52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
चिंता का विषय बनी रही है। मेरा विश्वास है कि उन पर ऐसे कुछ लोगों का ऋण है जिन्होंने उनकी मत वर्षों में सहायता की है और वह उसमें से कुछ भी लौटाने में समर्थ नहीं है। वह इस बारे में कठोर भी बन जाते हैं जब कोई उनसे ऋण चुकाने के लिए कहता है। जैसा कि आप जानते हैं, वह कुछ समय से इस बात के लिए आतुर थे कि उन्हें हाई कोर्ट में अथवा अन्यत्र कोई स्थान मिल जाए जहां वह अपनी जीविका कमाने के लिए समर्थ बन सकें। उन्होंने मुझे कुछ समय तक ऐसे व्यक्ति का आभास दिया कि वह अपने ही अनुयायियों के लिए कर रहे कार्य में रूचि नहीं रखते तथा किसी अन्य क्षेत्र में कार्य करने के लिए आतुर है। दुर्भाग्यवश, वह अपने ही स्थान की कठिनाइयों को उन प्रभावों का कारण मानते हैं जो उनके विरूद्ध है क्योंकि वे दलित वर्ग के सदस्य हैं। इससे यह विश्वास करना सरल है कि हमे अनुचित रूप से उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि हम यह नहीं सोचते कि दलित वर्गो के समर्थन की चिंता करनी आवश्यक है। मैं इस बात को अधिक पसंद करता कि उनके लिए कुछ किया जाए और मुझे आशा है, कि यदि आपकी परिषद् में अधिक विस्तार करना संभव है तो उन्हें सम्मिलित कर लिया जाए। केवल वैयक्तिक आधार पर ही नहीं, अपितु दलित वर्गो के हित को बनाए रखने के लिए भी वह महारों की भर्ती में असहायक रहे हैं और इस दिशा में उन्होंने अधिक बल नहीं दिया, इस बात के बावजूद भी कि वह महारों को युद्ध करने वाली यूनिटों में लिए जाने के लिए काफी प्रयत्न करते रहे हैं। फिर भी महारों की भर्ती जारी हैं, परंतु इतनी नहीं जैसी कि तब होती जब वह वास्तव में महारों की सहायता करना चाहते।
अम्बेडकर ने जो कटुता दिखाई है उसे छोड़कर, मैं नहीं समझता कि क्रिप्स की समझौता-वार्ता से हमारी स्थिति खराब हुई है, और कुल मिलाकर देखा जाये तो शायद परिणम कुछ लाभदायक ही रहा है।