सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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(2) इस नए संविधान में भारत के सभी वर्तमान प्रांत शामिल नहीं होंगे अपितु
केवल वे प्रांत ही शामिल होंगे जो इस संविधान को अपने ऊपर लागू
करना चाहें। इस हेतु प्रांतों को यह अधिकार दिया गया है कि वे यह निर्णय
करें कि क्या उन्हें नए संविधान में सम्मिलित होना है अथवा उससे बाहर
रहना है। यह निर्णय मतदान द्वारा किया जाएगा जिसमें केवल बहुमत ही
यह घोषणा करने के लिए पर्याप्त है कि इस मामले पर क्या निर्णय लिया
जाए।
(3) संविधान सभा को ब्रिटिश सरकार के साथ संधि करने की आवश्यकता
होगी। इस संधि में जातीय और धार्मिक संरक्षण और सुरक्षा के लिए उपबंध
शामिल किए जाएंगे। ब्रिटिश सरकार इस संधि पर हस्ताक्षर के बाद अपनी
प्रभुसत्ता को हटा लेगी और संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान लागू किया
जाएगा।
सारांश में, महामहिम सरकार की योजना की यह रूपरेखा है। संविधान सभा का प्रस्ताव नया प्रस्ताव नहीं है। इसे कांग्रेस द्वारा उस समय प्रस्तुत किया गया था जब युद्ध प्रारंभ हुआ था, और इसमें महत्वपूर्ण यह है कि कांग्रेस के इस प्रस्ताव को महामहिम की सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। श्री एमेरी ने 14 अगस्त, 1940 को हाऊस ऑफ कामन्स में संविधान सभा के बारे में यही बात कही थीः-
‘‘कांग्रेस के नेताओं ने........... एक उल्लेखनीय संगठन गठित कर लिया है जो
भारत में सबसे दक्ष राजनीतिक संस्था है और, जैसा कि इसका भारत के राष्ट्रीय
जीवन का प्रतिनिधित्व करने का दावा है, यदि यह भारत के अन्य तत्वों की ओर
से बोलने में सफल हो सकी, तो इनकी मांगे चाहे कितनी भी बढ़-चढ़ कर क्यों
न हो, हमारी समस्या कई अर्थों में आज की अपेक्षा कहीं अधिक सरल हो जाती।
यह सत्य है कि कांग्रेस ब्रिटिश इंडिया में सबसे बड़ी अकेली पार्टी है, परंतु भारत
की ओर से बोलने का उसका दावा, भारत के जटिल राष्ट्रीय जीवन के अन्य बहुत
महत्वपूर्ण तथ्यों द्वारा नकारा गया है। यह अन्य तत्व अपने अधिकार पर बल देते
हैं, न केवल सांख्यिक अल्पसंख्यक वर्गों के रूप में अपितु भावी भारतीय नीति में
अलग-अलग घटकों के रूप में भी। इन तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण समुदाय है बड़ा
मुस्लिम समुदाय। उसे भौगोलिक निर्वाचन-क्षेत्रों के बहुमत द्वारा चुनी गई संविधान
सभा द्वारा बनाए गए संविधान से कुछ लेना-देना नहीं है। किसी भी संवैधानिक
विचार-विमर्श में ये लोग इस अधिकार का दावा करते हैं कि उनका एक अलग
अस्तित्व माना जाए और वे कृतसंकल्प है कि केवल ऐसे संविधान को स्वीकार