5. क्रिप्स प्रस्तावों पर डा. अम्बेडकर का वक्तव्य - Page 74

सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार

59

मुसलमान डोमीनियों में पूर्णतया बांट दिया जाए। मुझे आज इस योजना की अनेक

तथा दुस्तर आपत्तियों के बारे में, कम से कम इसके वर्तमान उग्र स्वरूप में,

कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। मैं केवल इस बात पर जोर दूंगा कि इससे

स्थायी अल्पसंख्यकों की समस्या का समाधान किए बिना उस समस्या को कुछ

लघुतर क्षेत्रों में खिसका दिया गया है।’’

23 अप्रैल, 1941 को फिर उन्होंने हाउस ऑफ कामन्स में अपने भाषण में इस समस्या का उल्लेख किया और निम्न शब्दों में अपनी बात कही-

‘‘मुझे इस सदन में तथाकथित पाकिस्तान की योजना के मार्ग की वृहद व्यावहारिक

कठिनाइयों के बारे में बहस नहीं करनी है और न ही मैं अठारहवीं शताब्दी में

भारत के इतिहास की दुःखद स्थिति के बारे में अथवा आज अपने समक्ष बलकान

देशों के दुःखद अनुभवों के बारे में उल्लेख करने की आवश्यकता है जो बताते

हैं कि भारत की आवश्यक एकता का खंडन किए जाने में भयंकर खतरे निहित

हैं। आखिर, भारत में ब्रिटेन की सबसे बड़ी उपलब्धि, जिसका हमें गर्व भी है,

यह है कि हमने इस देश को एकता प्रदान की है।’’

संविधान सभा और पाकिस्तान के बारे में एक वर्ष पूर्व महामहिम सरकार के ये विचार थे। यह नितांत स्पष्ट है कि संविधान सभा का प्रस्ताव कांग्रेस की तुष्टि के लिए था और पाकिस्तान का प्रस्ताव मुस्लिम लीग को अपने साथ में करना था। दलित वर्गों के लिए प्रस्ताव क्या है? यदि संक्षेप में कहा जाए, तो उनके हाथ-पांव बंधे थे, और उन्हें हिन्दू जाति को सौंप दिया गया था। हिन्दुओं ने उन्हें कुछ भी नहीं दिया, उन्हें रोटी के स्थान पर पत्थर दिया। जहां तक संविधान सभा का प्रश्न है, दलित वर्गों को धोखा देने के अलावा यह कुछ नहीं है। इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि संविधान सभा में उनकी क्या स्थिति होगी और संविधान सभा के राजनीतिक कार्यक्रम के बारे में भी कोई संदेह नहीं है। संविधान सभा में दलित वर्गों के लिए कोई प्रतिनिधि नहीं हो सकते, क्योंकि इन प्रस्तावों में कोई भी सांप्रदायिक कोटा निर्धारित नहीं किए गए है। यदि वे संविधान सभा में शामिल किए जाते हैं तो उन्हें मुक्त, स्वतंत्र और निर्णायक मत देने का अधिकार नहीं होगा। सर्वप्रथम, दलित वर्गों के प्रतिनिधि बहुत अल्पसंख्या में होगे। दूसरे, संविधान सभा के सभी निर्णय सर्वसम्मति द्वारा स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। बहुमत द्वारा किसी भी प्रश्न पर निर्णय लिया जा सकता है, चाहे उसका संवैधानिक महत्व कुछ भी हो। यह स्पष्ट है कि ऐसी पद्धति के अनुसार संविधान सभा में दलित वर्गो की आवाज नहीं सुनी जा सकती। तीसरे, सानुपातिक प्रतिनिधित्व की वर्तमान पद्धति के अनुसार संविधान सभा में ऐसी