5. क्रिप्स प्रस्तावों पर डा. अम्बेडकर का वक्तव्य - Page 75

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

शर्तों के अंतर्गत सदस्यों को निर्वाचित किया जाएगा जो महामहिम के प्रस्तावों में दी गई हैं। इससे हिन्दू जाति लाभ उठा सकती है जिसे वास्तव में संविधान सभा में दलित वर्गो के प्रतिनिधियों को नामांकित करने का अधिकार है। ऐसे दलित वर्गों के प्रतिनिधि उन हिन्दुओं के हाथ की कठपुतली होंगे। चौथे, संविधान सभा में अधिकांश स्थानों को कांगेस के प्रतिनिधि भरेंगे जो संविधान सभा की बहुसंख्यक पार्टी होंगे तथा अपने ही कार्यक्रम चलाएंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि श्री गांधी के दलित वर्गों के सामाजिक उत्थान के लिए किए गए प्रयत्नों के बारे मेंं कुछ भी क्यों न कहा जाए परंतु वे संविधान में भारत के राष्ट्रीय जीवन में अलग या विशिष्ट तत्व के रूप में दलित वर्गों को राजनीतिक मान्यता देने के नितांत विरूद्ध हैं। यदि ऐसी स्थिति है, तो संविधान सभा की बहुसंख्यक पार्टी का कार्यक्रम वर्तमान संविधान में दलित वर्गों को पहले ही दी गयी सुरक्षाओं को भी समाप्त कर देगा।

यदि कोई व्यक्ति यह समझ ले कि संविधान सभा में क्या निहित है, तो वह यह स्वीकार करेगा कि महामहिम की सरकार ने अपने प्रस्तावों में दलित वर्गों को अक्षरशः भेडि़यों के सामने फेंक दिया है। यह कहा जा सकता है कि जब कि ऐसी संविधान सभा है जो दलित वर्गों को संवैधानिक सुरक्षाओं से निषिद्ध कर सकती तो महामहिम की सरकार इस बात में सतर्क रही है कि संविधान सभा के साथ उसकी संधि के उपबंधों में उनके वे प्रस्ताव सम्मिलित कर लिए जाएं जिनका उद्देश्य दलित वर्गों के हितों की सुरक्षा करना है। संधि का यह प्रस्ताव स्पष्टतया आयरिंश विवाद के समाधान के लिए महामहिम की सरकार द्वारा अपनाई गई योजना से लिया गया है। इस संधि के बारे में यह नहीं बताया गया है कि महामहिम की सरकार द्वारा इसमें क्या सुरक्षा साधन सम्मिलित किए जायेंगे। यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि इसमें ऐसे राजनीतिक सुरक्षा साधनों की प्रकृति संख्या और तरीके के संबंध में महामहिम की सरकार और दलित वर्गों के बीच मतभेद हो सकता है जो नए संविधान के अंतर्गत दलित वर्गो के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।

दूसरा और उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न इस संधि के बारे में यह है कि इस संधि की कानूनी स्थिति क्या होगी? क्या इस संधि को संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान का एक भाग माना जाएगा जिससे कि यदि संविधान में कोई भी ऐसी व्यवस्था हो जो संधि से मेल न खाए जो क्या वह व्यवस्था अवैध होगी और रद्द कर दी जाएगी? अथवा क्या यह संधि दोनों सरकारों- भारतीय राष्ट्रीय सरकार और महामहिम की सरकार-के बीच एक संधि मात्र ही होगी जैसी कि कोई व्यापारिक संधि होती है? यदि यह संधि पहली प्रकार की है, तो यह देश का कानून होगी और उसके पीछे भारत सरकार की वैध अनुमति होगी। दूसरी ओर यदि यह संधि दूसरे प्रकार की