सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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संधि है, तो उसके पीछे कोई भी वैध अनुमति नहीं होगी। इसकी अनुमति राजनीतिक अनुमति होगी। कोई भी संधि उस संविधान को दबा नहीं सकती जिसे राष्ट्रीय सरकार ने बनाया है और जिसका स्पष्टतया डोमिनियन स्टेटस से विरोध है, जैसा कि आयरिश फ्री स्टेट के बारे में पाया गया था। इस संधि के पीछे केवल राजनीतिक अनुमति होगी। यह स्पष्ट है कि इस प्रकार की अनुमति का प्रयोग सरकार की प्रकृति और लोक मत की अवस्था पर निर्भर करता है।
यदि इस तथ्य को मान लिया जाए तो इससे दो प्रश्न उभरते हैंः- (1) महामहिम की सरकार के पास संधि के दायित्वों को लागू करने के लिए क्या उपाय हैं? (2) क्या महामहिम की सरकार भारतीय राष्ट्रीय सरकार से इस संधि की शर्तों को मनवाने के लिए इन उपायों द्वारा दबाव डालने को तैयार होगी? पहले प्रश्न के संबंध में यह स्पष्ट है कि इस संधि को प्रभावी बनाने के दो उपाय हैं- बल का प्रयोग तथा व्यापार युद्ध। जहां तक सैनिक शक्ति का प्रश्न है, भारतीय सेना उपलब्ध नहीं होगी। यह पूर्णतया नवीन भारतीय राष्ट्रीय सरकार के नियंत्रण में स्थानांतरित कर दी जाएगी। अतः महामहिम की सरकार इस संधि के लागू किये जाने के उपायों से वंचित होगी। यह विश्वास करना असंभव है कि महामहिम की सरकार संधि के अनुपालन के लिए राष्ट्रीय सरकार को दबाने हेतु अपनी सेना भेजेगी। व्यापार युद्ध भी संभव नहीं है। यह घातक नीति है। भू-वृत्तियों की वसूली के लिए आयरिश स्वतंत्र देश के साथ आयरिश युद्ध का अनुभव प्रकट करता है कि दूकानदारों का राष्ट्र इसकी अनुमति नहीं देगा चाहे यह उनके हित तथा प्रतिष्ठा के लिए ही क्यों न हो।
इसलिए दलितों के लिए यह संधि खोखली है और उनके प्रति एक क्रूर मजाक है। महामहिम की सरकार ने इन प्रस्तवों को भेजा है ताकि भारतीय इनका स्वागत कर सकें। परंतु न तो महामहिम की सरकार और न सर स्टफोर्ड क्रिप्स ने इस बात की कोई व्याख्या दी है कि ऐसे प्रस्तावों को भारतीयों के लिए क्यों भेजा गया जिनकी वे कुछ महीने पूर्व भर्त्सना कर रहे थे। एक वर्ष पूर्व महामहिम की सरकार ने कहा था कि वह संविधान सभा की स्वीकृति नहीं देगी क्योंकि यह अल्पसंख्यकों के प्रति अन्याय होगा। अब महामहिम की सरकार संविधान सभा की स्वीकृति के प्रति अन्याय के लिए तैयार है। एक वर्ष पूर्व महामहिम की सरकार ने कहा था कि वह पाकिस्तान की अनुमति नही देगी क्योंकि इससे भारत परस्पर विरोधी प्रदेशों में विभक्त हो जाएगा। आज वह भारत के विभाजन की अनुमति देने के लिए तैयार है। एक महान साम्राज्य की सरकार कैसे सारी सोच-समझ खो बैठी है? इसके बारे में यही स्पष्टीकरण है कि युद्ध के परिणामस्वरूप महामहिम की सरकार डर गई है। ये प्रस्ताव साहस खो देने का परिणाम हैं। यह डर कितना बड़ा है जिसने महामहिम की सरकार को घेर लिया