सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
सहमति’’ की बात कहीं गई है।
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जहां तक दलित वर्गो का संबध है, मैं ऐसी किसी घोषणा से अवगत नहीं हूं जिसके फलस्रूप दलित वर्गों को उससे निचले स्तर पर रखा गया हो जो मुसलमानों को दिया गया था। मैं 10 जनवरी, 1941 को बम्बई में वायसराय के भाषण से एक उद्धरण देता हूं जिससे यह विदित हो जाएगा कि दलित वर्गो को मुसलमानों के साथ रखा गया था।
‘‘अल्पसंख्यकों के बारे में लगातार दावे किए जाते हैं। मैं उनमें से दो का ही संदर्भ देना चाहता हूं। ये बड़े अल्पसंख्यक वर्ग मुस्लिम और अनुसूचित जातियां हैं। गारंटियां अतीत में अल्पसंख्यकों को दी गई थीं- कि उनकी स्थिति की सुरक्षा की जाए और उन गारंटियों को निभाया जाए।’’
इस पक्षपातपूर्ण भेद से जो अब किया गया है उससे अल्पसंख्यकों की स्थिति गिरती है और संवैधानिक दृष्टिरोध से यह उनके विरूद्ध हानिकारक भेदभाव है। पारस्परिक युद्ध से देश के प्रति अनादर और गद्दारी की भावना फैलेगी। यह बात ब्रिटिश सरकार के लिए विचारणीय है कि क्या उन लोगों की मित्रता प्राप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए जिन्होंने शायद पहले ही अन्य मित्रों के चयन करने का निर्णय कर लिया है क्योंकि इससे वह उन लोगों को खो बैठेगी जो उसके वास्तविक मित्र हैं। इन प्रस्तावों में महामहिम सरकार की ओर से आकस्मिक परिवर्तन दिखाई देता है। उसके द्वारा उन प्रस्तावों का रखा जाना जिनको उसने अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर आक्रमण कहा था, इस बात का संकेत है कि उसने ताकत के आगे पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया है। यह म्यूनिख-मानसिकता है, इसका सार यह है कि अन्य व्यक्तियों का बलिदान करके स्वयं को बचाया जाए। यही वह मानसिकता है जो उन प्रस्तावों में स्पष्ट झलकती है। मेरी ब्रिटिश सरकार को यह सलाह है कि वह उन प्रस्तावों को वापस ले ले। यदि वह अधिकारों तथा न्याय और अपने वादों के लिए लड़ नहीं सकती तो उसे चाहिए कि वह शांति ही बनाए रखे। इस प्रकार वह कम से कम अपना सम्मान तो बचा सकती है।