7. युद्ध मंत्रिमंडल आलेख - Page 82

सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार

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के प्रतिनिधियों के चुनाव की वर्तमान पद्धति के अधीन दलित वर्गों को संविधान सभा में बहुत कम प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा क्योंकि संविधान सभा के अधिकांश तथाकथित सदस्य कांग्रेस के सदस्य हैं। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या हमने जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों से दलित वर्गों को एक अल्पसंख्यक वर्ग माना है। मैंने उत्तर दिया कि हमने यह माना है। इसके बाद उन्होंने पूछा कि उनकी सुरक्षा के लिए संधि में किस प्रकार के प्रावधान रखने की संभावना है। मैंने बताया कि ये प्रावधान लीग ऑफ नेशन्स की अल्पसंख्यकों की संधियों के आधार पर होंगे और यदि इन्हें संविधान में विशेष उपबंध बनाया जाता है तो संभवतः इन्हें संधि में दोहराया जाएगा और विवाद के मामले में शायद किसी बाह्य प्राधिकार के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा और भारत सरकार इस प्रकार दिए गए निर्णयों का पालन करेगी। यदि भारत सरकार ऐसा करने में असफल रही तो इसे संधि का उल्लंघन माना जाएगा और ब्रिटिश सरकार ऐसे कदम उठा सकेगी जैसा वह विशेष परिस्थितियों में युक्ति -संगत समझे। मैंने कहा कि यद्यपि यह सुरक्षा का स्वरूप उन्हें अपर्याप्त प्रतीत हो सकता है, तथापि भारत में आत्म- निर्णय के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए, तो यही एक संभव उपाय है।

अगले दिन डॉक्टर अम्बेडकर और श्री राजा ने मुझे लिखा और बताया कि दलित वर्गो के लिए ये प्रस्ताव स्वीकार्य नहीं हैं क्योंकि वे इन्हें हिन्दू राज की न मिटने वाली पद्धति का भाग समझते हैं तथा वे यथाशक्ति इन प्रस्तावों का विरोध करेंगे। उन्होंने हमसे निवेदन किया कि उनकी चिंता को महामहिम सरकार तक पहुंचा दिया जाए तथा उन्हें इस बात से अवगत करा दिया जाए कि दलित वर्ग इसे विश्वास-भंग समझेंगे यदि महामहिम की सरकार उन पर ऐसा संविधान आरोपित करेगी जिसके लिए उनकी मुक्त और स्वैच्छिक अनुमति नहीं दी गई है तथा इसमें वे उपबंध निहित नहीं हैं जो उनके हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।