11. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में हुई बहस का सारांश - Page 90

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ऽवायसराय की कार्यकारिणी परिषद् में

हुई बहस का सारांश

संख्या 298 का अनुलग्नक

दिसम्बर, 1942

वायसराय ने प्रारंभ में स्पष्ट किया कि यह विचार-विमर्श आवश्यक रूप से अनौपचारिक आधार पर था तथा इसका विद्यमान संवैधानिक व्यवस्थाओं पर प्रभाव नहीं पड़ता, और तत्पश्चात संक्षेप में तथा वस्तुपरक रूप से उन तीन पक्षों पर प्रकाश डाला जो उन्होंने अग्रिम रूप से वांछनीय समझेः-

(क) परिषद् के पूर्ण भारतीयकरण की व्यवस्था,

(ख) सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के नियंत्रण और हस्तक्षेप की शक्तियों का दूर किया

जाना अथवा कम किया जाना, और

(ग) धारा 93 के प्रावधानों में प्रशासन की विशुद्ध सरकारी प्रकृति का दूर किया

जाना। इसके बाद आम खर्चा प्रारंभ हुई।

डॉक्टर अम्बेडकर (श्रम सदस्य) कोई भी परिवर्तन उस समय तक किए जाने के विरोधी थे जब तक कि वे अगस्त 1940 [*] की घोषणा के अनुसार न हों (जिसमें महत्वपूर्ण अल्पसंख्यकों से विचार-विमर्श करने की व्यवस्था थी) इसके अधीन ही वे परिवर्तन के पक्ष में थे क्योंकि जिस किसी चीज की आवश्यकता थी, वह थी एक सशक्त सरकार, अर्थात् ऐसी सरकार जिसके पीछे लोकमत हो। प्रांतों में मंत्रिमंडलीय सरकार सर्वोत्तम थी चाहे वह केवल अल्पसंख्यक सरकार ही क्यों न हो। सलाहकारों की अपेक्षा कार्यकारी परिषद् अधिक अच्छी होगी। जहां तक केन्द्र की बात है, स्वयं भारतीयकरण अपने आप में कांग्रेस को संतुष्ट नहीं करेगा और उन्हें रूष्ट कर देगा, और क्या गैर-कांग्रेस तत्व संतुष्ट किए जाने योग्य थे? भारतीयकरण होने से पूर्व

ऽ ट्रान्सफर ऑफ पॉवर, खंड 3 (संख्या 298 का अनुलग्नक) पृष्ठ 246 (डॉक्टर अम्बेडकर से संबंधित

उद्धरण यहां दिए गए हैं)। शेष विचार-विमर्श छोड़ दिया गया है- संपादक