सत्ता हस्तान्तरण संबंधी महत्वपूर्ण पत्र-व्यवहार
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नहीं दिया गया है। नौ करोड़ मुसलमानों को पांच सीटें, पांच करोड़ अछूतों को एक सीट तथा 60 लाख सिखों को एक सीट देना राजनीतिक गणित में ऐसा विचित्र और दोषपूर्ण कृत्य है जो न्याय तथा सामान्य बुद्धि के मेरे विचारों के बिल्कुल विपरीत है। मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता। यदि आवश्यकताओं की दृष्टि से विचार किया जाए तो अछूतों को उतना ही प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए जितना मुसलमानों को दिया जाता है, चाहे इससे अधिक न हो। आवश्यकताओं को एक ओर छोड़ दिया जाए और अछूतों की जनसंख्या पर ही ध्यान दिया जाए तो भी उन्हें कम से कम तीन सदस्यों के स्थान मिलने चाहिए। इसके बजाय उन्हें पन्द्रह सदस्यों की परिषद् में केवल एक स्थान दिया गया है। यह असहनीय स्थिति है।
यह एक ऐसा मामला है जिसकी ओर आपका ध्यान 5 जून को आयोजित कार्यकारी परिषद् की बैठक में आकर्षित किया गया था, जब आपने परिषद् में महामहिम की सरकार के प्रस्तावों की व्याख्या की थी। छः तारीख की प्रातःकालीन बैठक में आपने उन आलोचनाओं का उत्तर दिया था जिन्हें परिषद् के सदस्यों ने प्रस्तावों की गुणवत्ता के बारे में पूर्व संध्या को उठाया था। स्वाभाविक रूप से मुझे आशा थी कि आप उस मुद्दे पर विचार करेंगे जो मैंने उठाया था। परंतु मुझे आश्चर्य है कि आपने पूर्णतया उसकी अवहेलना कर दी और उसके बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं किया। ऐसी बात नहीं है कि मैने पर्याप्त जोर नहीं दिया। मैंने पूरा जोर देकर अपनी बात कही थी। इससे मैंने निष्कर्ष निकाला कि या तो आपने इस मामले को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जितना यह था, अथवा आपने यह सोचा कि अपना विरोध जाहिर करने के अलावा मेरा कोई अन्य इरादा नहीं था। मुझे इस धारणा को हटाना है और बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में आपको यह बतलाना है कि यदि महामहिम की सरकार इस गलती को दूर करने में असफल रही तो मैं निश्चित कार्यवाई करूंगा और इसीलिए आपको यह पत्र लिखने की आवश्यकता महसूस करता हूं।
मुझे कभी भी दुःख महसूस नहीं होता यदि इस प्रकार का प्रस्ताव कांग्रेस या हिन्दू महासभा से प्राप्त होता। परंतु यह महामहिम की सरकार का निर्णय है। यहां तक कि सामान्य हिन्दू मत विधान सभा और कार्यपालिका में अनुसूचित जातियों के अधिक प्रतिनिधित्व के पक्ष में है। सप्रू समिति के प्रस्तावों में सामान्य हिन्दू मत का संकेत मिलता है। महामहिम की सरकार का प्रस्ताव प्रतिगामी ही समझा जा सकता है। सप्रू समिति ने कहा हैः-
‘‘भारत सरकार अधिनियम (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट) में सिखों और
अनुसूचित जातियों को दिया गया प्रतिनिधित्व अपर्याप्त और अन्यायपूर्ण है
तथा उसमें पर्याप्त वृद्धि की जानी चाहिए। उनके प्रतिनिधित्व की बढ़ी मात्रा