13. डॉ. अम्बेडकर का फील्ड मार्शल वाइकाउंट वेवल को पत्र - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

का निर्णय संविधान-निर्माण सभा पर छोड़ दिया जाना चाहिए।’’

‘‘खंड (ख) के उपबंधों के अधीन संघ की कार्यपालिका तभी पूर्ण मंत्रिमंडल

होगी जब निम्नलिखित समुदायों का उसमें प्रतिनिधित्व हो, अर्थात्ः-

( i ) अनुसूचित जातियों के अतिरिक्त हिन्दू।

( ii ) मुसलमान।

( iii ) अनुसूचित जातियां।

( iv ) सिख।

( v ) भारतीय ईसाई।

( vi ) एंग्लो-इंडियन।

‘‘(ख) कार्यपालिका में इन समुदायों का प्रतिनिधित्व यथासंभव विधान सभा

में उनकी संख्या का प्रतिबिंब होगा।’’

मैं यह भी बताना चाहूंगा कि कार्यकारी परिषद् के मेरे दो हिन्दू साथियों ने एक ज्ञापन आज सुबह आपको प्रस्तुत किया हैऽ जिसमें उन्होंने कहा है कि महामहिम की सरकार के प्रस्तावों में अनुसूचित जातियों के लिए जो प्रतिनिधित्व दिया गया है, वह अपर्याप्त और अनुचित है। मुझे इस बात से आघात पहुंचा है कि महामहिम की सरकार सभी मामलों में अनुसूचित जातियों की न्यासधारी है परंतु फिर भी अपनी अनवरत दुहराई गई घोषणाओं के बावजूद इन जातियों के प्रति अनुदार, अनुचित और अन्यायपूर्ण तरीका अपनाया गया है जो उस स्थिति से भी बदतर है जो प्रबुद्ध हिन्दू मत ने पैदा की है। इसलिए मैं अपना अनिवार्य पवित्र कर्त्तव्य समझता हूं कि अपनी शक्ति में प्रत्येक साधन द्वारा इस प्रस्ताव का विरोध करूं। यह प्रस्ताव अछूतों के लिए मौत का पैगाम है जिसमें उनकी मुक्ति के गत 50 वर्षों के प्रयत्नों पर पानी फेर दिया गया है। चाहे कुछ भी क्यों न हो, यदि महामहिम की सरकार अपनी अनेक घोषणाओं के बावजूद अछूतों के भाग्य को हिन्दू-मुसलमानों को मिलाकर उनकी दया पर छोड़ना चाहती है तो महामहिम की सरकार भले ही ऐसा कर ले परंतु मैं अपने ही लोगों के दमन में भागीदार नहीं बन सकता। मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि महामहिम की सरकार से यह कहूं कि इस भूल को ठीक करें और अछूतों को कार्यकारी परिषद् में कम से कम तीन स्थान दिलाएं। यदि महामहिम की सरकार इसका अनुमोदन करने को तैयार नहीं है तो महामहिम की सरकार को यह जानता चाहिए कि मैं नव-गठित कार्यकारी परिषद् का सदस्य नहीं बन सकता चाहे मुझे इसमें कोई भी स्थान दिया जाए।

ऽ देखिए संख्या 482 (ट्रांसफर ऑफ पॉवर)