संघ बनाम स्वतंत्रता
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कैसे उत्पन्न होगी कि उनका राष्ट्रीय सरकार से संबंध है, जब कि उन्हें किसी भी और हर प्रभाव से बहिष्कृत किया गया है और यह भी अनुभव नहीं होने दिया गया कि कोई राष्ट्रीय सरकार भी है? मुझे भय है कि भारत का यह संयुक्त राज्य मात्र संयुक्त राज्य जैसी संस्था के अतिरिक्त कुछ और नहीं होगा। इनमें इन राज्यों में से एक राष्ट्र - निर्माण की शक्ति का अभाव है और संभवतः इस योजना के निर्माताओं का यह इरादा कभी भी नहीं रहा होगा।
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संघीय योजना का एक अन्य लाभ उसके पक्षधरों ने बताया है कि यह ब्रिटिश भारत के नव - लोकतंत्रों और देशी राज्यों के प्राचीन निरंकुश शासन तंत्र को एकल राजनीतिक प्रासाद की छत्रछाया में लाता है और इन दोनों को एक प्रासाद के नीचे लाने से प्रजातंत्र और निरंकुश शासन तंत्र के पारस्परिक संबंध को बढ़ाता है, और ब्रिटिश भारत के प्रजातंत्र द्वारा देशी राज्यों के स्वेच्छाचारी शासन के प्रजातंत्रीकरण की प्रक्रिया को सामर्थ्य प्रदान करता है। इसको परखने के लिए और इसमें कितनी शक्ति विहित है, इसके विषय में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि भौगोलिक आधार पर देशी राज्य और ब्रिटिश भारत के प्रांत निकट हैं। उनमें नियमित संपर्क है। ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों के निवासी जातीय, भाषायी और सांस्कृतिक तौर पर एक समग्र के ही हिस्से हैं। इन सभी संपर्कों और जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति की समग्र एकता के बावजूद ब्रिटिश भारत ने देशी राज्यों में प्रचलित शासन व्यवस्था के स्वरूप को प्रभावित नहीं किया है। इसके विपरीत जब कि ब्रिटिश भारत निरंकुशता से प्रजातंत्र की ओर अग्रसर हुआ है, देशी राज्य अपनी स्थिर शासन - प्रणाली के साथ उसी प्रकार बने हुए हैं। इसलिए जब तक अधिनियम में कोई विशेष बात नहीं आती जो कि ब्रिटिश भारत को यह सामर्थ्य प्रदान कर सके कि वह अपने विधान-मंडल और कार्यपालिका द्वारा देशी राज्यां को प्रभावित करे, तब तक इस तर्क में कोई सार नहीं है। क्या इस अधिनियम में ऐसी कोई चीज है, जो ब्रिटिश भारत को यह शक्ति प्रदान करती है कि वह राज्यों को प्रभावित कर सके? इस संबंध में धारा 34(1) का अवलोकन किया जाना चाहिए, जिसका संबध्ां विधान-मंडल में बजट प्रावधानों पर वाद - विवाद और मतदान प्रक्रिया से है।
इस धारा की जांच करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धारा 33 की उप-धारा (3) के पैरा (क) और पैरा (च) से संबंधित प्राक्कलनों पर संघीय विधान-मंडल में बहस भी नहीं हो सकती है। उप-धारा (3) के पैरा (क) में गर्वनर - जनरल के वेतन, भत्तों और उसके कार्यालय तथा अन्य खर्चे की मदों का जिक्र है, जिसके प्राक्कलन आर्डर - इन - काउंसिल द्वारा तैयार किए जाते हैं। पैरा (च) का संबंध इस अधिनियम के अंतर्गत महामहिम को संघ के राजस्व में से देय उस धन से है जिसे वह देशी राज्यों के प्रति कृत्यों के निर्वहन हेतु व्यय करते हैं। एक अन्य धारा जिसका कि संबंध इस विषय से है, वह धारा 38 है। धारा 38 वह धारा है, जो संघीय विधान-मंडल की कार्यवाही को विनियमित करने की