संघ बनाम स्वतंत्रता
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वाद - विवाद करना और प्रश्न पूछना। बजट पर बहस की शुरुआत के पीछे यह सिद्धांत है कि कार्यपालिका को प्रदाय तब तक प्रदान नहीं किए जाएंगे जब तक कि वह जनता की तकलीफों को दूर नहीं करती। प्रजातंत्र का नारा है - धन दिए जाने से पहले शिकायतें दूर करो। बजट पर बहस द्वारा जनता की शिकायतें कार्यपालिका के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती हैं। इसलिए यह एक वैध विशेषाधिकार है, जैसा कि धारा 34 से ज्ञात होता है, सदन में राज्यों की शिकायतें कार्यपालिका के समक्ष न रखी जाने पर विधान-मंडल को प्रतिबंधित किया जाता है। इस प्रकार पूछताछ करने और प्रश्न पूछने का अधिकार प्राप्त है जो वैध विशेषाधिकार है, लेकिन उसे भी छीन लिया गया है। विधान-मंडल को सदैव उचित प्रस्ताव पर न्यायपालिका के आचरण की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन उसे भी निकाल दिया गया है। यह देखना बड़ा मुश्किल है कि संघीय विधान-मंडल वास्तव में देशी राज्यों के आंतरिक प्रशासन को किस तरह प्रभावित करता है। राज्यों के आंतरिक प्रशासन के विषय में कोई प्रश्न पूछने अथवा प्रस्ताव लाने की न सिर्फ ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों को मनाही है, वरन् यही अयोग्यता राज्यों के प्रतिनिधियों पर भी थोपी गई है, जो कि कुप्रशासन के शिकार हैं।
संघीकृत राज्यों द्वारा ब्रिटिश भारत पर जिस प्रभाव का प्रयोग किया जा सकता है, अब उसकी तुलना की जाए।
प्रथमतः, संघीकृत राज्यों के प्रतिनिधियों को संघीय विधानमंडल में किसी प्रश्न को पूछने या किसी मामले को उठाने पर प्रतिबंध नहीं है। यह तथ्य कि कोई प्रश्न अथवा मामला ब्रिटिश भारत से सरोकार रखता है अथवा ब्रिटिश भारत के आंतरिक प्रशासन से संबंध रखता है, संघीकृत राज्यों के प्रतिनिधियों द्वारा मामला उठाने पर रोक नहीं लगाता।
दूसरे, संघीकृत राज्यों के प्रतिनिधियों पर संघीय सरकार के आर्थिक प्रस्तावों पर बहस और मतदान करने पर कोई पाबंदी नहीं है। ऐसा कोई प्रस्ताव जो सिर्फ ब्रिटिश भारत को प्रभावित करता है और राज्यों को प्रभावित नहीं करता, उनके रास्ते में किसी प्रकार की कानूनी अड़चन पैदा नहीं करता।
तीसरे, कानून बनाने के मामले में संघीकृत राज्यों के प्रतिनिधियों को संघीय विधानमंडल के समक्ष लाए गए किसी भी मामले पर मतदान करने की स्वतंत्रता है। ऐसी दो सूचियां हैं, जिन पर संघ का विधायी प्राधिकार रहता है - संघीय सूची और समवर्ती सूची। प्रांतों को पूर्णरूपेण संघीय सूची से प्रतिबद्ध किया गया है। एक संघीकृत राज्य इससे पूरी तरह बंधा हुआ नहीं है। प्रांत समवर्ती सूची से पूरी तरह प्रतिबद्ध है। एक संघीकृत राज्य बिल्कुल भी प्रतिबद्ध नहीं है। फिर भी, राज्यों के प्रतिनिधियों को किसी भी मामले पर जो दोनों सूचियों में से किसी एक में आते हैं, मतदान करने का अधिकार प्राप्त है। दूसरे शब्दों में, संघीय योजना राज्यों को ब्रिटिश भारत के लिए विधि - निर्माण का अधिकार प्रदान करती है, जबकि ब्रिटिश भारत को राज्यों के संबंध में विधि - निर्माण का अधिकार नहीं है, सिवाय इस सीमा तक कि राज्य इन दो विधायी सूचियों के अधीन रहना पसंद करते हैं।