2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 103

86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

ब्रिटिश भारत के ऊपर राज्यों के विधायी प्रभाव क्षेत्र किसी भी प्रकार कम अथवा व्यर्थ नहीं है। समवर्ती सूची तक सीमित रहने पर भी इसमें 36 विषय आते हैं। इन 36 विषयों में दंड विधि, आपराधिक एवं नागरिक दंड संहिता, पेशे, समाचार - पत्र, पुस्तकें और छपाईखाने आदि शामिल हैं। यह स्पष्ट है कि ये महत्वपूर्ण विषय हैं। इनसे प्रांतों में लोगों की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। अब जैसे कि राज्यों को समवर्ती सूची के अंतर्गत सभी प्रकार के विधि - निर्माण में भाग लेने और मतदान का अधिकार प्राप्त है, देशी राज्यों को प्रांतों में ब्रिटिश भारतीयों के अधिकारों विशेषाधिकारों और स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले विधि - निर्माण के सभी अधिकार और प्राधिकार प्राप्त हैं।

आगे विधायी क्षेत्र में, जहां तक कि इसका संबंध समवर्ती सूची से है, राज्यों ने बिना किसी अनुग्रह के प्राधिकार प्राप्त कर लिया है। उन्हें विधि - निर्माण की स्वतंत्रता है और उन्हें अपने विषय में विचार करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जिन कानूनों को वे बनाते हैं, उनसे वे प्रतिबद्ध नहीं हैं। उनका आचरण उतना ही अनुत्तरदायी हो सकता है, जितना कि वे इसे बनाना चाहें।

यद्यपि यह कहना कम बयानी है कि राज्यों को ब्रिटिश भारत में केवल प्रशासन और विधि - निर्माण को प्रभावित करने का अधिकार प्राप्त है। सत्य यह है कि राज्य ब्रिटिश भारत पर अपना वर्चस्व बनाए रख सकते हैं, क्योंकि वे संघीय सरकार में एक मंत्रालय की सत्ता बरकरार रख सकते हैं, भले ही ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों के बहुमत में विशुद्ध रूप से भारत को प्रभावित करने वाले मामले में इसे पराजित कर दिया हो। यह इसलिए है कि उन्हें किसी प्रस्ताव पर, जिसमें अविश्वास प्रस्ताव भी सम्मिलित है, मतदान करने का अधिकार प्राप्त है, चाहे प्रस्ताव से संबंधित वह मामला उन्हें प्रभावित करता है अथवा नहीं। एक ओर जहां राज्य ब्रिटिश भारत के आंतरिक मामलों पर बहस में भाग ले सकते हैं, वहीं ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों को राज्यों के मामलों पर चर्चा करने का वैसा ही अधिकार प्राप्त नहीं है। इस अन्याय और विसंगति को दूर करने के लिए - ऐसे प्रश्नों पर जिनका ब्रिटिश भारत के आंतरिक मामलों से संबंध न हो - राज्यों के बहस और मतदान के अधिकार को सीमित करने की कोशिश की गई थी। लेकिन राजाओं और उनके प्रतिनिधियों ने सदैव इस तरह का अंतर किए जाने का विरोध किया और इस बात पर जोर दिया कि जिस मामले पर मंत्रालय का भाग्य आश्रित हो, उन्हें उस सरकार के भविष्य के बारे में निर्णय करने का अधिकार होना चाहिए। संविधान ने राजाओं के इस दृष्टिकोण को सही करार दिया और ब्रिटिश भारत के दृष्टिकोण को ठुकरा दिया।

यह तुलना दर्शाती है कि राज्यों को कानून ब्रिटिश भारत के मामलों पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त है और उसी कानून के जरिए ब्रिटिश भारत राज्यों के किसी भी प्रकार प्रभावित करने के मामले में पंगु है। इस सच्चाई को सभी को स्वीकार कर लेना चाहिए। दूसरे शब्दों में, संघीय योजना ब्रिटिश भारत की मदद नहीं करती, अपितु उसके मार्ग में बाधाएं उत्पन्न करती है, जिससे कि देशी राज्यों के प्रजातंत्रीकरण की प्रक्रिया में तेजी न आ सके। दूसरी ओर यह देशी राज्यों की ब्रिटिश भारत में प्रजातंत्र को कुचलने में मदद करती है।