90 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
उपयोगितापूर्ण तुलना की जा सकती है। धारा 72 डी की उप-धारा (2) के अनुसार :
वार्षिक व्यय के प्राक्कलनों और प्रांतीय राजस्व को एक विवरण के रूप में प्रत्येक वर्ष
काउंसिल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा और किसी भी वर्ष में स्थानीय शासन के प्रस्तावों
को प्रांतीय राजस्व और अन्य धनराशियों के विनयोजन हेतु अनुमोदन मांगों के रूप में
काउंसिल में मतदान हेतु प्रस्तुत किया जाएगा। काउंसिल चाहे तो मांग पर स्वीकृति दे
सकती है अथवा स्वीकृति देने से मना कर सकती है और इसमें उल्लिखित धनराशि को
मदों में कमी करके घटा सकती है, जिसके लिए अनुदान लेखे बनाए गए हैं।
वर्तमान 1935 के अधिनियम की धारा 34 से तुलना करें। धारा 34 की उप-धारा (1)
के अनुसार :
व्यय के उन प्राक्कलनों को जिनका संबंध संघ के राजस्व स्रोतों पर भारित है,
विधान-मंडल में मतदान हेतु प्रस्तुत नहीं किया जाएगा, लेकिन इस उप-धारा से यह
नहीं समझा जाना चाहिए कि धारा 33 की उप-धारा (2) के पैरा (क) अथवा पैरा (च)
में उल्लिखित व्यय से संबंधित प्राक्कलनों के सिवाय इनमें से किन्हीं प्राक्कलनों पर
विधान-मंडल के किसी भी सदन में चर्चा रोकी जा सकती है।
धारा 33 के अनुसार संघ के राजस्व पर भारित व्यय में आरक्षित विषयों पर होने वाले व्यय सम्मिलित हैं। दोनों अधिनियमों के प्रावधानों की तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने अधिनियम में धारा 72डी के द्वारा हस्तांतरित और आरक्षित विषयों में कोई भेद नहीं किया गया था। जहां तक विधान-मंडल की प्रदाय स्वीकृति की शक्तियों का प्रश्न है, आरक्षित विषयों पर व्यय विषयक विधान-मंडल में न सिर्फ बहस हो सकती थी, वरन उस पर मतदान भी हो सकता था। नए अधिनियम की धारा 34 के अंतर्गत जो प्रावधान है, उसके अनुसार संघीय विधान-मंडल आरक्षित विषयों के व्यय पर बहस तो कर सकता है, लेकिन मतदान नहीं कर सकता है। यह एक महत्पूर्ण अंतर है। पुराने संविधान के अंतर्गत आरक्षित विषय भी विधान-मंडल की वित्तीय शक्तियों के अंतर्गत आते थे। वर्तमान संविधान के अंतर्गत वे संघीय विधान-मंडल की वित्तीय शक्तियों से स्वतंत्र हैं। यह सही है कि प्रांतीय संविधान में आरक्षित विषयों पर व्यय की मदों पर विधान-मंडल में मतदान अंतिम नहीं होता था। धारा 72डी के उपबंध के अधीन गवर्नर को प्रदत्त शक्तियों में यह प्रावधान था कि ‘ऐसी किसी मांग के बारे में ऐसे कार्य करना जैसे कि उस पर सहमति प्राप्त हो गई है, किसी भी बात के होते हुए इस प्रकार की सहमति को रोकने अथवा विधान-मंडल द्वारा धनराशि में कटौती किए जाने पर भी यदि मांग आरक्षित विषयों से संबंधित है और गवर्नर यह प्रमाणित करता है कि मांग में रखा गया व्यय उस विषय से संबंधित उसके उत्तरदायित्व के निर्वाह में आवश्यक है।’ यह भी सच है कि 1935 के अधिनियम में आरक्षित विषयों पर व्यय की धनराशि 42 करोड़ रुपये सुरक्षित कर दी गई थी। लेकिन पुराने संविधान में आरक्षित विषयों के बारे में वैसा ही अंतर विद्यमान रहता है जो कि तब विधान-मंडल के वित्तीय नियंत्रण के अधीन थे, जब कि नए संविधान में ऐसा नहीं है। यह अंतर कोई मामूली अंतर नहीं है। प्रदायों की स्वीकृति कार्यपालिका के उत्तरदायित्व को लागू करने