संघ बनाम स्वतंत्रता
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को जो सीटें मिली हुई है, वे राजाओं द्वारा नामनिर्देशन से भरी जाएंगी। जो सीटें ब्रिटिश भारत के लिए नियत हैं, वे चुनाव द्वारा भरी जानी हैं। इसलिए संघीय विधान-मंडल एक विजातीय विधान-मंडल है, जिसका गठन आंशिक रूप से चुनाव द्वारा और आंशिक रूप से नामनिर्देशन द्वारा किया जाता है।
पहला विचारणीय प्रश्न यह है कि राजाओं के प्रतिनिधि संघीय विधान-मंडल मेंं किस प्रकार का व्यवहार करेंगे। क्या वे संघीय कार्यपालिका से स्वतंत्र होंगे अथवा इसके अधीनस्थ होंगे, इसके बारे में भविष्यवाणी करना कठिन है। लेकिन कुछ विशेष प्रभावों को जो नामांकन के दौरान अपनी भूमिका अदा करते हैं, ध्यान में रखना होगा। यह एक अविवादास्पद तथ्य है कि ब्रिटिश सरकार दावा करती है कि राज्यों के ऊपर उसकी प्रभुसत्ता का अधिकार है। प्रभुसत्ता एक बहु - प्रयोजनीय शब्द है, जो इन अधिकारों का बोध कराता है, जिनका प्रयोग सम्राट भारत सरकार के राजनीतिक विभाग द्वारा राज्यों के ऊपर कर सकता है। राजनीतिक विभाग इन अधिकारों में से जिस अधिकार के प्रयोग का दावा करता है, वह है भारतीय राजाओं को विशेष नियुक्तियों के संबंध में परामर्श देना। यह सुविदित है कि जिसे परामर्श कहते हैं, वह कूटनीतिक शब्दावली में आदेश है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि राजनीतिक विभाग राजाओं द्वारा इन रिक्तियों को भरने के लिए सलाह देने के अधिकार का दावा करेगा। अगर ऐसा हो जाए तो इसके परिणाम क्या होंगे? इसका नतीजा यह होगा कि राजाओं के प्रतिनिधिगण दूसरे अर्थ में एक ऐसे सरकारी समूह का रूप धारण करेंगे, जिसकी निष्ठा न जनता के प्रति, न राजाओं के प्रति, वरन् भारत सरकार के राजनीतिक विभाग के प्रति होगी। आगे दो बातों पर और ध्यान देना चाहिए। प्रथम यह कि प्रभुसत्ता संघीय सरकार से परे है। इसका अर्थ है कि मंत्रियों को राज्यों के प्रतिनिधियों के नामनिर्देशन के विषय में सलाह देने का अधिकार नहीं होगा और विधान-मंडल इसकी आलोचना नहीं करेगा। गवर्नर - जनरल से थोड़ा भिन्न वे वायसराय के नियंत्रण के अंतर्गत होंगे। दूसरे, राजाओं का यह अधिकारिक समूह कोई छोटा समूह नहीं। निचले सदन में जो दल 187 सीटें रखता है, वह बहुमत का दावा कर सकता है। उच्च सदन में एक दल जिसके पास 130 सीटें हैं, बहुमत का दावा कर सकता है। निचले सदन में राजाओं को 125 सीटें मिली हुई हैं। उन्हें बहुमत जताने के लिए 62 सदस्यों का एक दल चाहिए। उच्च सदन में उनके 104 सदस्य हैं, उन्हें 26 की आवश्यकता है। कार्यपालिका के पास इतनी भारी शक्ति होती है। तब ऐसी विधायिका कैसे स्वतंत्र होगी? अपने पास इतनी शक्ति रखते हुए सुरक्षित अर्द्धभाग हस्तांतरित अर्द्धभाग पर नियंत्रण कर सकता है।
ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों का व्यवहार कैसा होगा? मैं कोई सकारात्मक विवरण पेश नहीं कर सकता। लेकिन मैं इसे ध्यान में रखना ठीक समझता हूं कि कुछ राज्यों में नियमित बजट नामक कोई चीज नहीं है और न वहां स्वतंत्र लेखा - परीक्षा का प्रावधान है। राजाओं को ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधियों का समर्थन खरीदने में कोई कठिनाई नहीं होगी। राजनीति एक गंदा खेल है और ब्रिटिश भारत के राजनीतिज्ञों के बारे में कहना