94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
कठिन होगा कि वे भ्रष्टाचार से मुक्त है और जबकि गुप्त रूप से खरीदारी की जा सकती है तो यह खतरा वास्तविक है।
संघीय योजना को जिस प्रकार भी देखना चाहें, देखें और उत्तरदायित्व विषयक प्रावधानों का जैसा भी चाहें विश्लेषण करें, लेकिन आप पाएंगे कि वास्तविक उत्तरदायित्व जैसा कुछ नहीं है।
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ऐसा कोई नहीं है, जो यह स्वीकार न करे कि यह योजना एक अखिल भारतीय संघ के लिए दोषपूर्ण है। मतांतर तभी होता है, जब यह प्रश्न पूछा जाए कि हम इसके बारे में क्या करें। समय - समय पर प्रमुख भारतवासियों ने इस प्रश्न के जो उत्तर दिए हैं, उनसे ज्ञात होता है कि मोटे तौर पर इस संघ के विषय में दो काफी भिन्न रवैए हैं। एक उनका रुख है जो यह सोचते है कि यह बुरा तो है ही, हमें इस संघ को स्वीकार कर लेना चाहिए और इसकी जो अच्छाइयां हैं, उन्हें काम करके हासिल कर लेना चाहिए। दूसरी ओर, कुछ ऐसे रुख वाले भी हैं, जो सोचते हैं कि इससे पूर्व कि संघ के संविधान को स्वीकृत करके काम शुरू किया जाए, इसमें खास परिवर्तन होने चाहिएं। ऐसा ज्ञात हुआ है कि कांग्रेस और साथ ही नरम दल, दोनों ही इस प्रश्न पर एक हैं। दोनों ने यह घोषित कर दिया है कि इससे पूर्व कि वे इस संघ को कार्य करने के लिए स्वीकृत करें, इसमें कुछ विशेष परिवर्तन होने चाहिएं।
यह संघ भारत के अधिकांश लोगों को स्वीकार नहीं है, यह प्रश्न से परे है। प्रश्न यह है कि किस तरह हम संविधान में संशोधन करना चाहेंगे? हमें किन परिवर्तनों की मांग करनी है? इस प्रश्न के विषय में कांग्रेस और नरम दल ने जो प्रस्ताव पारित किए हैं, वहीं से हमें शुरुआत करनी है।
कांग्रेस ने 1938 में हरिपुरा में आयोजित अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया, जो इस प्रकार है :
कांग्रेस ने नवीन संविधान को रद्द कर दिया है और यह घोषणा की है कि भारत का
संविधान, जिसे लोग स्वीकार कर सकते हैं, स्वतंत्रता पर आधारित होना चाहिए और यह
संविधान सभा द्वारा लोग स्वयं ही तैयार कर सकते हैं, जिसमें कोई विदेशी प्राधिकरण
हस्तक्षेप नहीं करेगा। कांग्रेस ने संविधान को रद्द करने की इस नीति का अनुसरण
करते हुए भी प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडलों के गठन की अनुमति दे दी है, जिसका उद्देश्य
यह है कि देश में स्वतंत्रता संग्राम को सशक्त बनाया जाए। प्रस्तावित संघ के संबंध
में इस प्रकार के विचार अस्थायी रूप से अथवा सीमित समय के लिए लागू नहीं होते
तथा इस संघ के आरोपण से भारत को भारी क्षति पहुंचेगी और ये बंधन अधिक कड़े
हो जाएंगे, जो साम्राज्यवादी शासन के अधीन देश को जकड़े हुए हैं। संघ की यह