96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
संविधान में संघ से संबंधित भाग में तत्काल परिवर्तन करे, ताकि उसे सामान्य रूप
से स्वीकार्य किया जा सके।
संघ का यह भी मत है कि ये संशोधन संविधान के सफल कार्यकरण के लिए
परमावश्यक है।
क्या कांग्रेस अथवा उदारवादी संघ द्वारा जिन परिवर्तनों की मांग की गई है, वे संघ की रद्द करने की वर्तमान प्रवृत्ति को संघ की स्वीकृति में बदलने के लिए पर्याप्त होंगे? जहां तक मेरा विचार है, मुझे यह बताने में कोई झिझक नहीं है कि इन प्रस्तावों में जिन परिवर्तनों की मांग की गई है, यदि उन्हें स्वीकार कर भी लिया जाए तो भी मेरे विचार में अंतर नहीं आएगा। मेरे विचार से क्या ब्रिटिश संसद संघीय योजना के किसी भी विवरण को शीघ्र ही बदलने के लिए तैयार है - यह एक अत्यंत महत्वहीन विचार है। मैं इस मामले में ऐसा विचार रखता हूं कि संघीय योजना के प्रति की गई आपत्तियां किंचित भी न हटाई जाएंगी, भले ही ब्रिटिश संसद इन प्रस्तावों में पारित की गई मांगों में से प्रत्येक मांग को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाए। मेरे विचार में मूल प्रश्न यह है कि क्या इस संघीय योजना में इतनी क्षमता है कि इस बात का सूत्रपात हो सके कि भारत अंत में अपने उद्देश्य की पूर्ति कर लेगा और इसी दृष्टि से मैं संघीय योजना में रुचि रखने वाले सभी लोगों की संघीय योजना की जांच के लिए आह्वान करता हूं।
भारत के राजनीतिक विकास का लक्ष्य क्या है? यह स्थायी और स्पष्ट प्रतीत नहीं होता। भारत के लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने का दावा करने वाली कांग्रेस का लक्ष्य अच्छी सरकार के गठन से था। फिर इसने अच्छी सरकार की बजाए स्वशासन अथवा उत्तरदायी सरकार और फिर उत्तरदायी सरकार के स्थान पर देशको औपनिवेशिक राज्य का दर्जा दिए जाने तथा अंततः स्वतंत्रता की मांग की। ऐसी स्थिति में कांग्रेस आत्म - निरीक्षण करने के लिए कुछ समय के लिए रुकी। इसके बाद डांवाडोल की स्थिति रही। अब यह फिर से औपनिवेशिक राज्य की मांग कर रही है और यह हमारी भूल नहीं होगी यदि कांग्रेस के अनुसार हम इस मांग को भारत के लक्ष्य के रूप में स्वीकार करें। अब प्रश्न यह है कि क्या संघीय योजना निश्चित समय में औपनिवेशिक राज्य के रूप में स्फुटित हो सकती है?
अनेक भारतीयों का यह विचार है कि औपनिवेशिक राज्य का प्रश्न एक ऐसा उपहार है, जो ब्रिटिश संसद के हाथों में है। यदि ब्रिटिश संसद इसे स्वीकृत करने का इरादा कर ले तो इसके मार्ग में कोई बाधा उपस्थित नहीं होगा।
भारतीयों की यह धारणा है कि यदि भारत को औपनिवेशक राज्य का दर्जा प्राप्त होने की कोई आशा नहीं है तो इसका कारण यह है कि ब्रिटिश संसद ने इसे देने से इंकार कर दिया है। उन्होंने अपनी धारणा के समर्थन में यह संदर्भ दिया है कि ब्रिटिश संसद ने भारत के लक्ष्य के रूप में औपनिवेशिक राज्य घोषित करने के लिए 1935 के अधिनियम में एक प्रस्तावना जोड़ने से इंकार कर दिया है।