2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 114

संघ बनाम स्वतंत्रता

97

यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि इस प्रकार की प्रस्तावना की मांग सर्वथा उचित थी। 1929 में ब्रिटिश संसद के सभी राजनीतिक दलों की सहमति से लॉर्ड इर्विन ने यह घोषणा की थी कि भारत के राजनीतिक विकास का लक्ष्य औपनिवेशिक राज्य स्थापित करना है। इसलिए भारतीय कोई नई मांग प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं। इसके बारे में गवर्नर - जनरल और वायसराय आधिकारिक रूप से अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं, परन्तु ब्रिटिश सरकार ने उक्त प्रस्तावना को स्थान देने से इंकार कर दिया। इंकार करना ब्रिटिश सरकार का एक विचित्र व्यवहार था, परंतु इंकार करने के समर्थन में जो दलीलें दी गई हैं, वे और भी आश्चर्यजनक हैं। ब्रिटिश सरकार ने प्रस्तावना के सम्मिलित न किए जाने के अपने व्यवहार को न्यासंगत ठहराने के लिए विवधि प्रकार की शर्तें और दलीलें प्रस्तुत कीं।

पहला आधार यह था कि यह प्रस्तावना निरर्थक थी और इसकी कोई भी प्रचलन शक्ति नहीं थी। परंतु इस प्रकार की दलील का सरलता से निराकरण किया जा सकता था। संसद के सभी अधिनियमों में प्रस्तावनाएं हैं, जिनमें संसद के उद्देश्य और इरादे को अभिव्यक्त किया गया है। यह कहना सत्य है कि इसमें कोई वैधिक प्रभाव नहीं होता है, परंतु इसके साथ ही अदालतों में यह निर्णय नहीं दिया गया कि प्रस्तावना निरर्थक है। दूसरी ओर, जहां कहीं भी किसी धारा को व्यक्त करने में कोई संदेह होता है, अदालतें सदैव प्रस्तावना का सहारा लेती हैं, ताकि अधिनियम के उद्देश्य को समझा जाए और किसी भी संदेहास्पद वाक्य - रचना के समाधान के लिए इसका उपयोग किया जाए। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश सरकार ने दूसरा मापदंड अपनाया और 1919 के अधिनियम को निरस्त कर दिया, परंतु उस अधिनियम की प्रस्तावना को बनाए रखा। यह बात अत्यंत अजीब है। सर्वप्रथम यदि प्रस्तावना व्यर्थ है, तो 1919 के अधिनियम के एक भाग के रूप में अधिनियमित प्रस्तावना को सुरक्षित रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। दूसरे, यदि 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना आवश्यक थी तो इसे 1935 के अधिनियम के एक भाग के रूप में नए तरीके से अधिनियमित कर देना चाहिए था, जिसे ब्रिटिश सरकार नहीं करेगी। इसकी बजाए उसने इस बात को वरीयता दी कि सिर को धड़ से अलग करके विचित्र दृश्य प्रसतुत किया जाए। अब इसका सिर 1919 के निरस्त अधिनियम और धड़ 1935 के वर्तमान अधिनियम के रूप में है। तीसरे, भारतीय लोग एक ऐसी प्रस्तावना चाहते थे, जिससे औपनिवेशक राज्य परिलक्षित हो, जैसा कि लॉर्ड इर्विन के घोषणा - पत्र में इसका उल्लेख किया गया है। 1919 के अधिनियम की प्रस्तावना सिर्फ उत्तरदायी सरकार की बात कहती है। इसमें औपनिवेशिक राज्य की केई बात नहीं कही गई है और 1919 के अधिनियम में प्रस्तावना को बनाए रखने का अर्थ यह था कि जहां तक संभव हो, इस मूर्खतापूर्ण कार्य के बारे में कम से कम कहा जाए।

ब्रिटिश संसद ने लक्ष्य के रूप में औपनिवेशिक राज्य को परिभाषित करने वाली प्रस्तावना को अधिनियमित करने से क्यों इंकार कर दिया? ब्रिटिश संसद मांग को स्वीकृति प्रदान करने की बजाए इधर - उधर क्यों देखती रही? इस संबंध में आमतौर पर यही स्पष्टीकरण