98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
दिया जाता है कि यह एलबियोन (इंग्लैंड) का विश्वासघात है। मेरा अपना विचार इससे नितांत भिन्न है। ब्रिटिश संसद ने प्रस्तावना के अधिनियम द्वारा औपनिवेशक राज्य का वचन इसलिए नहीं दिया क्योंकि उसने यह अनुभव किया कि इस वचन का पालन कर पाना उसकी शक्ति से परे है। ब्रिटिश संसद में ईमानदारी का अभाव नहीं था। वास्तव में यह उसकी ईमानदारी थी, जिसके कारण ऐसी प्रस्तावना को अधिनियम करने से उसने इंकार कर दिया, क्योंकि उसे यह पता था कि वह इस प्रकार की प्रस्तावना को लागू नहीं कर सकेगी। उसमें साहस का अभाव था कि भारतीयों को यह बता सके कि संघीय योजना में औपनिवेशिक राज्य के लिए कोई स्थान नहीं है।
संघीय योजना के अंतर्गत औपनिवेशिक राज्य क्यों संभव नहीं है? यह इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि उत्तरदायी सरकार प्राप्त करना संभव नहीं है। यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस प्रकार का औपनिवेशिक दर्जा प्राप्त करने के लिए भारत को सर्वप्रथम उत्तरदायी सरकार प्राप्त करनी होगी। एक उत्तरदायी सरकार प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आरक्षित विषयों को हस्तांतरित वर्ग में कर दिया जाए। यह औपनिवेशिक राज्य के विकास की प्रक्रिया की प्रिम अवस्था है।
आपमें से कुछ इन कारणों को जानना चाहेंगे कि मैं यह क्यों कहता हूं कि आरक्षित विषय हस्तांतरित विषय नहीं बन सकते। उन्हें अवश्य याद होगा कि प्रांतीय योजना में वे आरक्षित विषय थे, जैसा कि वे संघीय योजना में हैं और वे यह जानना चाहेंगे कि यदि आरक्षित विशय 20 वर्ष के अंतराल में हस्तांतरित विषय हो गए हैं, तो ऐसी क्या कठिनाई हो सकती है कि इस प्रकार की बातें संघीय पद्धति में न हों। चूंकि यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, अतः मैं इस संबंध में अपने तर्क देता हूं। सर्वप्रथम, प्रांतों का सादृश्य (समानता) सही नहीं है। इस बात पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि यह समानता ठीक क्यों नहीं है? यह इसलिए ठीक नहीं है कि प्रांतीय योजना में आरक्षित और हस्तांतरित विषयों के बीच भेद प्रशासकीय क्षमता की आवश्यकताओं पर आधारित था। आरक्षित और हस्तांतरित विषयों के मध्य भेद संघीय योजना में विधिसम्मत आवश्यकता पर आधारित होता है, प्रशासकीय क्षमता पर आधारित नहीं होता तथा इसके लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। साइमन कमीशन ने केन्द्र में द्वैध शासन की सिफारिश क्यों नहीं की, उसका एक कारण यह है, क्योंकि उसने महसूस किया कि सभी विभागों की दक्षता को प्रभावित किए बिना प्रशासकीय दृष्टि से दो विभागों में आरक्षित और हस्तांतरित विषयों का विभाजन करना संभव नहीं था, और भारत सरकार के साइमन कमीशन के संबंध में व्यक्तव्य पर इस विचार की पूर्णतया सहमति हुई। इसलिए यह विभाजन अपने आधार पर प्रशासकीय नहीं है। यह विधिसम्मत आवश्यकता का परिणाम है। यह आधारभूत भेद है और इसके संबंध में कभी भी अपना ध्यान नहीं हटाना चाहिए।
यह विधिसम्मत आवश्यकता किस प्रकार उत्पन्न होती है? मेरा कहना है कतिपय विषयों को आरक्षित करने की विधिसम्मत आवश्यकता देशी राज्यों के कारण उत्पन्न होती