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संघ बनाम स्वतंत्रता

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है। मैं यह भी कहता हूं कि कतिपय विषयों को आरक्षित मानने के लिए आवश्यकता नहीं होगी, यदि संघीय शासन ब्रिटिश भारत के प्रांतों तक ही सीमित कर दिया जाए। विषयों का आरक्षण संघीय शासन में देशी राज्यों के प्रवेश का प्रत्यख परिणाम है।

देशी राज्यों की स्थिति में यह क्या है कि कतिपय विषयों को आरक्षित विषय मानना आवश्यक है? इस प्रश्न का उत्तर देने से पूर्व मैं आपका ध्यान भारत सरकार अधिनियम की धारा 180 की ओर आकर्षित करना चाहूंगा। धारा 180 में बताया गया है :

भारत मंत्री द्वारा अथवा उनकी ओर से इस अधिनियम के भाग - 3 के लागू होने से पूर्व

सम्राट के देशी राज्यों के साथ संबंधों के कार्यों का संपन्न करने के बारे में कोई भी

अनुबंध अधिनियम के भाग - 3 के लागू होने से प्रभावी माना जाएगा, मानों वह संविदा

महामहिम सम्राट की ओर से किया गया है तथा तदनुसार भारत मंत्री - इन - काउंसिल

को इस अनुबंध के दिए गए संदर्भों का अर्थ लगाया जाएगा।

यह धारा उस विचार को वैधानिक रूप देती है, जिसे राजाओं ने बटलर समिति के समक्ष प्रस्तुत किया था और समिति ने स्वीकार कर लिया था कि देशी राज्यों की संधि इंग्लैंड के सम्राट के साथ है, न कि भारत सरकार के साथ।

दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस सिद्धांत से क्या निष्कर्ष निकलता है। अब इस सिद्धांत से जो कुछ भी निष्कर्ष निकलता है, वह अत्यंत जटिल है, परन्तु दुर्भाग्यवश उचित सावधानी और ध्यान के बिना इसे आगे बढ़ जाने दिया गया है। राजाओं ने निश्चयपूर्वक कहा है कि चूंकि देशी राज्यों की संधि इंग्लैंड के सम्राट के साथ है, अतः संधियों के अंतर्गत आने वाले दायित्वों को पूरा करने का कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व इंग्लैंड के सम्राट के ही हाथ में है, अतः ऐसी स्थिति में इंग्लैंड के सम्राट को इन दायित्वों को निभाने के लिए सर्वदा तैयार रहना चाहिए।

वह दायित्व क्या हैं, जो राजाआें के साथ के संधियों के कारण इंग्लैंड के सम्राट पर आते हैं? इंग्लैंड के सम्राट पर आए दायित्व के नियम और संधियों के अनुकूल इंग्लैंड के सम्राट द्वारा यह दायित्व स्वीकार किया गया है कि राजाओं को आंतरिक विद्रोह तथा बाह्य आक्रमण से बचाया जाए।

सम्राट इस दायित्व को किस प्रकार पूरा कर सकता है? यह तर्क दिया जाता है कि सम्राट के लिए इस दायित्व को निभाने का एक ही उपाय है कि ब्राह्य मामलों तथा सेना को सम्राट द्वारा ही विशेष नियंत्रण में रखा जाए।

अब आप समझ सकते हैं कि मैं यह क्यों कहता हूं कि आरक्षित विषयों की आवश्यकता वैधिक आवश्यकता के कारण है। यह वैधिक आवश्यकता सम्राट के संधि संबंधी दायित्वों के कारण पैदा होती है और जब तक संधि के अनुसार संबंधों का आधार बना रहता है, जैसा कि धारा 180 में कहा गया है, तब तक आरक्षित विषय हस्तांतरित नहीं हो सकते। चूंकि आरक्षित विषय हस्तांतरित विषय नहीं हो सकते, अतः उत्तरदायी सरकार के लिए कोई स्थान नहीं है और औपनिवेशिक राज्य की तो और भी कम संभावना है।