2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 117

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मैंने अंतिम लक्ष्य की दृष्टि से संविधान का विश्लेषण किया है और उससे मेरा विश्वास है कि किसी को भी यह कहने में हिचक नहीं होगी कि यह संविधान एक स्थिर और कठोर संविधान है। इसमें परिवर्तन नहीं हो सकता, अतः इसका विकास नहीं हो सकता। यह ऐसा संविधान है, जिसकी जड़ पर ही कुठाराघात किया गया है और यह भारत के लोगों के लिए ही विचार करने योग्य है कि क्या वे इसे स्वीकार करेंगे।

अपने लक्ष्य की दृष्टि से मैंने इतने लंबे समय तक संविधान की जांच की है और मैं यह महसूस करता हूं कि इससे आपको जो कष्ट हुआ है, उसके लिए आपसे क्षमायाचना करूं। इस प्रश्न पर कुछ लोगों के दृष्टिकोण के कारण ही मैंने इस विषय का विस्तारपूर्वक विवेचन करने का प्रयास किया है ओर इस संबंध में मैं यही सफाई दे सकता हूं। मैं यह महसूस करता हूं कि कोई भी संविधान पूर्ण नहीं हो सकता। अपूर्णताएं रह जाती हैं। परंतु मैं सोचता हूं कि अपूर्णताओं और आंतरिक तथा सहज कमियों के बीच अंतर स्पष्ट कर लेना चाहिए। अपूर्णताओं को दूर किया जा सकता है। परंतु सहज कमियों को पूरा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस अथवा उदारवादी संघ के प्रस्तावों में की गई मांगें यदि मान भी ली जाएं, तो वे अपूर्णताओं को दूर कर लेंगी। परंतु क्या वे कमियों को दूर करेंगी? मैं अपूर्णताओं की ओर ध्यान नहीं दूंगा, यदि मुझे आश्वस्त कर दिया जाए कि कोई कमियां नहीं हैं। इस संविधान की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह औपनिवेशिक राज्य की ओर अग्रसर नहीं होगा। कांग्रेस अथवा उदारवादी संघ में से कोई भी इस तथ्य से अवगत नहीं है कि यह कमी विद्यमान है। उनकी मांगों का भारत के राजनीतिक विकास के लक्ष्य से कोई संबंध नहीं है। वे उसका उल्लेख भी नहीं करते। यह आश्चर्यजनक बात है कि कांग्रेस के सदस्य राजनीतिक सत्ता हथियाने की संभावनाओं पर इतने मोहित हो गए हैं कि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उनकी मांगों में इस दिशा में ब्रिटिश सरकार की घोषणा का कोई उल्लेख नहीं है। परंतु यदि कांग्रेस भूल भी जाती है तो भारत के लोग नहीं भूल सकते और उन्हें भूलना भी नहीं चाहिए। यदि ऐसा किया गया तो यह घातक सिद्ध होगा। यह स्थिति किसी व्यक्ति विशेष के लिए उतनी ही घातक हो सकती है, जितनी कि लोगों के लिए यह भूल जाने पर होगी कि मार्ग का पड़ाव घर नहीं होता तथा बिना यह जाने हुए कि क्या वह मार्ग घर को जाता है अथवा नहीं, किसी भी मार्ग का अनुसरण करना अपने आपको गलत रास्ते पर ले जाना और गर्त में गिराना है।

आप मुझे गलत न समझें। मैं उतावला आदर्शवादी नहीं हूं। मैं अनुक्रमवाद में विश्वास करने वाले उस व्यक्ति की भर्त्सना नहीं करता, जो प्रतीक्षा करने तथा चीजों को किस्तों में लेने के लिए तैयार है, यद्यपि यह ऐसा व्यक्ति होता है जो एक रुपये के वैध दावे का अधिकारी है, परन्तु केवल एक आना मांगता है और उस समय अपनी विजय घोषित करता है, जब उसे एक पाई मिल जाती है। ऐसे व्यक्ति को दया का पात्र ही मानना चाहिए। मैं जो कुछ भी चाहता हूं, वह यह है कि यदि परिस्थितियां अनुक्रमवादी बनने के लिए बाध्य करें तो हमें यथार्थवादी बनने से नहीं चूकना चाहिए। किसी भी एक किस्त के स्वीकार करने से पूर्व, हमें सावधानीपूर्वक इसकी जांच कर लेनी चाहिए और अपने को इस बात