2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 118

संघ बनाम स्वतंत्रता

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से संतुष्ट कर लेना चाहिए कि वह पूरे दावे की प्राप्ति का द्योतक है, अन्यथा जैसा प्रायः घटित होता है कि जो एक क्षण के लिए अति श्रेष्ठ है, वह दूसरे ही क्षण बेहतर स्थिति के लिए शत्रु बन जाता है।

आपमें से कुछ पूछना चाहेंगे कि भारत किस प्रकार औपनिवेशक राज्य बन सकता है। मेरा उत्तर यह है कि भारत तभी औपनिवेशिक राज्य बन सकता है, जब संघ में सम्मिलित राजा इसको स्वीकार करने की अनुमति दें। यदि राजा लोग भारत के औपनिवेशिक राज्य बनने में आपत्ति करते हैं तो भारत को औपनिवेशिक राज्य का दर्जा प्राप्त नहीं हो सकता। संघ भारत के राजनीतिक विकास की डोर राजाओं के हाथों में थमाए हुए हैं। भारत का भाग्य राजाओं के द्वारा नियंत्रित किया जाएगा।

भविष्य के इस विचार को आप में से अधिकांश लोग अधिक अनोखा महसूस करेंगे। हम सभी संसद की सार्वभौमिकता के संबंध में डायसी के विचार से संतृप्त हैं। हम सभी ने उनसे सीखा है कि संसद सर्वोच्च है, यहां तक कि वह इतनी सर्वोच्च मानी जाती है कि वह पुरुष को महिला और महिला को पुरुष बनाने के सिवाय सब कुछ कर सकती है। यह अस्वाभाविक नहीं होगा कि आप में से कुछ यह पूछें कि राजा लोग इस मार्ग में किस प्रकार से अवरोध पैदा कर सकते हैं, जबकि ब्रिटिश संसद सर्वोच्च है। आप इस प्रस्थापना को स्वीकार करने के लिए कुछ प्रयत्न करेंगे कि ब्रिटिश संसद को भारतीय संघ के संबंध में कोई सर्वोच्चता प्राप्त नहीं है। संघीय संविधान के परिवर्तन के संबंध में उसका प्राधिकार अब भारत सरकार अधिनियम में बहुत ही सीमित है।

भारतीय राजनीतिज्ञों ने अपने दुख और आक्रोश की भावना को उस तथ्य से अभिव्यक्त किया है कि भारतीय विधायकों को अधिनियम द्वारा कोई भी निर्वाचनकारी शक्ति नहीं दी गई है।

भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत संघीय विधान-मंडल अथवा प्रांतीय विधान-मंडल में से किसी के पास भी संविधान में परिवर्तन अथवा संशोधन करने की शक्तियां नहीं है। इस अधिनियम की धारा 308 के अनुसार केवल संघीय विधान-मंडल और प्रांतीय विधान-मंडल को यह अनुमति दी गई है कि वे संविधान में किसी भी परिवर्तन की सिफारिश करने हेतु कोई प्रस्ताव पारित कर सकते हैं और भारत मंत्री को इस बात के लिए बाध्य कर सकते हैं कि वह उस प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत करे। यह बात अमरीका, आस्ट्रेलिया, जर्मन फेडरेशन और स्विट्जरलैंड के संविधान में वर्णित उपबंधों के विपरीत है। ऐसा कोई कारण नहीं है कि भारत में विधान-मंडलों को कतिपय परिभाषित सीमाओं में इस प्रकार की संविधान निर्वाचनकारी शक्तियां नहीं दी जाएं, जबकि वे सभी वर्गों और सभी हितों के पूर्ण प्रतिनिधि हैं। चाहे जो कुछ भी हो, तथ्य यह है कि भारतीय विधान-मंडल संविधान में कोई भी परिवर्तन नहीं कर सकते और आरक्षित विषयों को स्थानांतरित विषयों में नहीं बदल सकते। यदि संविधान में परिवर्तन किया जाना है तो इसका प्राधिकार केवल ब्रिटिश संसद के पास ही है। परंतु कुछ ही लोग इस तथ्य से अवगत हैं कि संसद भी संघीय संविधान में परिवर्तन करने की कोई शक्ति नहीं रखती। यह सत्य है और जितनी जल्दी हम इसका अनुभव कर सकें, उतना ही अच्छा है।