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संघ बनाम स्वतंत्रता

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करता है, तो स्पष्टतया आप उन शर्तों में परिवर्तन करेंगे, जिनके अनुसार वे संघ में सम्मिलित होने के लिए स्वीकृति दे चुके हैं और निश्चय ही इससे एक ऐसी स्थिति पैदा होगी, जिसमें राजा लोग सही अर्थ में यह दावा कर सकेंगे कि उनके विलय - पत्र में परिवर्तन किया गया है। इसका निश्चय ही यह अर्थ है कि हम उस बिल के किसी भाग में संशोधन नहीं कर सकते, जो संधियों को प्रभावित करता है और जिनके अंतर्गत राजाओं ने सहमति व्यक्त की। यदि हम उनके विलय - पत्र को प्रभावित करने वाले बिल में कोई परिवर्तन करते हैं तो स्पष्टतया इससे वह समझौता भंग हो जाएगा, जो राजाओं और संसद के बीच में किया गया है तथा इसके बाद राजा लोग मुक्त हो जाएंगे।

प्रत्येक व्यक्ति द्वारा यह स्वीकार किया जाएगा कि राज्यों से जब संघीय ढांचे में सम्मिलित होने के लिए कहा जाएगा तो इस बिल की सामान्य योजना के अंतर्गत उन्हें संघ के कतिपय पक्षों के बारे में जानने का अधिकार होगा। यह एक बेतुकी स्थिति होगी, यदि किसी राज्य से इस महीने संघ में सम्मिलित होने के लिए कहा जाए और फिर यह सदन अगले महीने संघ के उपबंधों के आधारभूत पक्षों में परिवर्तन करे, जिसके लिए राज्य विलय के लिए तैयार हुआ था। इसलिए इस प्रकार की कोई अनुसूची आवश्यक है। इस बिल के वर्गीकरण द्वरा संवैधानिक कार्यप्रणाली में बदलाव लाए बिना संशोधन किया जाना चाहिए, जिसमें राज्यों ने विलय के लिए स्वीकृति दी है। अनुसूची की योजना अधिनियम के उपबंधों के बनाने के लिए है, जिनके संशोधन से राज्य के विलय - पत्र की वैधता प्रभावित नहीं होती है।

कोई सोचता है कि बिल के उन भागों को निर्धारित कर दिया जाए, जिसके संशोधन से राज्य के विलय - पत्र की वैधता प्रभावित नहीं हो और इसके विपरीत ऐसे विषयों को वर्गीकृत कर दिया जाए, जिनके संशोधन से विलय की वैधता प्रभावित होगी। इस प्रकार की अनुसूची तैयार करते समय इसकी परिभाषा करने में अधिक सावधानी रखी जानी चाहिए कि ऐसे क्या वैध मामले हैं, जिनमें राज्यों के शासकों को यह कहने का अधिकार है कि उनकी सहमति के बिना कोई संशोधन नहीं किया जाएगा। अलबत्ता कुछ सीमांत मामले भी होंगे। ऐसी स्थिति में लघु संशोधन किए जा सकते हैं, जिनसे वर्तमान स्थिति में कोई बड़ा अंतर वास्तव में न होगा और यह अत्यंत अतार्किक होगा, यदि राज्य इस प्रकार के संशोधनों पर आपत्ति उठाएं और यह कहें कि ‘हम इस विचार बिंदु पर अपने अधिकारों के लिए खड़े हैं, जो हमारे विलय - पत्र की वैधता को प्रभावित करता है।’ यह सही है कि कोई भी मामला जिसे मैं शक्ति का सामान्य संतुलन कह सकता हूं, जो वास्तव में कार्यकारी नियंत्रण के आरक्षण के प्रश्न तथा ऐसे मामले हैं जिन्हें गवर्नर - जनरल अपने विवेक द्वारा निपटा सकता है और ऐसे मामले जो संघ के निर्माण के लिए अधिक महत्व रखते हैं और राज्यों से जिन्हें स्वीकार करने को कहा गया है, उनकी सहमति के बिना उनमें संशोधन नहीं किया जाना चाहिए। गवर्नर - जनरल में विहित विशेष शक्तियों का कुल क्षेत्र संघ के आवश्यक लक्षणों में से एक