2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 121

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

लक्षण है। यह एक ऐसा भाग है, जिसके लिए राज्यों को यह कहने का अधिकार है,

‘वह एक परिवर्तन है’ अथवा ‘उसे परिवर्तित किया गया है।’ परंतु इससे भारत का

विकास किसी प्रकार से रुक नहीं सकता है। राज्यों के साथ विचार - विमर्श के लिए

कुछ विषय हो सकते हैं, क्योंकि वे उस संघ से पृथक किसी अन्य प्रकार के संघ की

रचना करेंगे, जिसमें विलय के लिए राज्य तैयार हुए हैं।

इसलिए यह प्रश्न उठता है कि उस समय क्या होगा, जब संसद इस प्रकार के परिवर्तन करे जो अनुसूची - 2 के अनुसार ऐसे परिवर्तन समझे जाते हैं जो विलय - पत्र को प्रभावित करेंगे, इस संबंध में उत्तर यह है कि राजाओं को यह अधिकार होगा कि वे संघ से बाहर हो जाएं। अतः इस परिवर्तन का परिणाम यह होगा क संघ भंग हो जाएगा।

ऐसे कौन से परिवर्तन है, जो विलय - पत्र को प्रभावित किए बिना नहीं किए जा सकते हैं? मैं आपका ध्यान कुछ ऐसे उपबंधों की ओर आकर्षित करना चाहूंगा, जिनके संबंध में अनुसूची - 2 में कहा गया है कि विलय - पत्र को प्रभावित किए बिना संसद द्वारा संशोधन नहीं किए जा सकते। अनुसूची - 2 के अनुसार संविधान में कोई भी ऐसे परिवर्तन नहीं किए जा सकते, जिनका संबंध (1) संघ के कार्यकारी प्राधिकार का गवर्नर - जनरल द्वारा प्रयोग; (2) गवर्नर - जनरल के कार्यों की परिभाषा; (3) संघ का कार्यकारी प्राधिकार; (4) मंत्रिपरिषद के कार्य और मंत्रियों का चयन तथा आह्वान और उनकी र्काविधि; (5) गवर्नर - जनरल के निर्णय करने का अधिकार कि क्या उसे यह अधिकार होगा कि वह अपने विवेक से कार्य करे अथवा अपने व्यक्तिक निर्णय का प्रयोग करे; (6) बाह्य मामलों और रक्षा के संबंध में गवर्नर - जनरल के कार्य; (7) भारत अथवा भारत के किसी भाग की शांति और अमन से संबंधित गवर्नर - जनरल के विशेष उत्तरदायित्व; (8) संघीय शासन की वित्तीय स्थिरता और साख; (9) देशी राज्यों के अधिकार और उनके शासकों के अधिकार तथा उनकी प्रतिष्ठा; (10) इस अधिनियम के द्वारा अथवा इसके अधीन अपने विवेक से कार्यों का निपटान अथवा अपने व्यक्तिक निर्णय का प्रयोग; (11) गवर्नर - जनरल को महामहिम के लिखित अनुदेशों; और (12) संघीय शासन के कार्य के संबंध में गवर्नर - जनरल के लिए भारत मंत्री के तत्वावधीन में अपने विवेक से सूचना के आदान - प्रदान तथा प्रेषण हेतु नियम बनाने।

अनुसूची - 2 उन बातों का व्यापक संग्रह है, जिसमें यह दिया गया है कि संविधान के अंतर्गत क्या न करें। मैंने इनमें से कुछ बातों का उल्लेख किया है। परंतु ये बातें यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि संविधान में परिवर्तन करने के लिए संसद के पास कितने सीमित प्राधिकार हैं।

संसद का प्राधिकार सीमित क्यों है? इस बात को समझने के लिए यह आवश्यक है कि संसद के प्राधिकार की सही सीमाओं को जाना जाए। कानून के अनुसार संसद का प्राधिकार कानून बनाने तक होता है और यह केवल ऐसे देशों पर लागू होता है, जो सम्राट के अधीनस्थ क्षेत्र हैं। राज्य सम्राट के अधीन नहीं हैं और उनमें से कोई भी, यहां तक कि उनमें से सर्वोत्तम राज्य भी संसद के कानून बनाने के प्राधिकार के अधीन नहीं हैं।